October 13, 2015

पुरस्कार वापसी विभाग बनाकर पुरस्कार लौटाने की ऑनलाइन व्यवस्था करे केंद्र सरकार

डॉ. महेश शर्मा 
केन्द्रीय कला एवं संस्कृति मंत्री,
भारत सरकार 

विषय- पुरस्कार वापसी विभाग बनाकर पुरस्कार लौटाने की ऑनलाइन व्यवस्था करने की मांग के संबंध में 

महोदय,


मै एक साधारण भारतीय के नाते आपको यह पत्र लिख रहा हूँ, जो कुछ पाखंडियों के करतूतों से उद्द्वेलित और इस तमाशे से हैरान। आपको विदित है ही कि मोदी विरोधियों में एक नया फैशन चला है, वे हर उस मौके की तलाश में जुटे रहते है, जहाँ प्रधानमंत्री जी के ऊपर कीचड़ उछालते हुए बेतुके अतार्किक सवाल उठाया जा सकें। ऐसे लोग बेहद संगठित, शातिराना अंदाज में और चुनिंदा मामलों में बवाल खड़ा करते है और इसपर निर्रथक बहस खड़ा करके जरुरी मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास करते रहते है। इन दिनों वे हर उस छोटी-बड़ी घटना को सांप्रदायिक रंग देना चाहते है, जो निहायती तौर पर एक आपराधिक घटना से ज्यादा कुछ नही होती। ये लोग उन्मुक्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार से हर चीज को जोड़कर फासीवादी जुमले इस्तेमाल करते है और हर घटना की जिम्मेवारी मोदी जी के मत्थे मढ़ते नही अघाते। इस काम में वे ललित निबंध, मार्मिक कविताएँ, भावुक खुला पत्र फुरसत में लिखा करते है। पीएम बनने से पहले तो हर कोशिश इनकी नाकाम रही, अब पीएम बनने के बाद मोदी विरोध में छलनी हो चुके उनके कलेजे को इस तरह की प्रयासों से सुकून तो मिलता ही है , मुफ़्त में प्रचार भी मिल जाता है। वैसे और चाहिए इन्हें क्या! साहित्यकार के नामपर ये वैचारिक नंगई पर उतर आए है, जो बेहद निराशा और हताशा का परिचायक मात्र है। 

October 6, 2015

"Decision to not contest Bihar election shows a fear of defeat on your face" Open letter to Nitish Kumar & Sushil Modi

Date: 6th October, 2015
Dear Nitish Ji and Sushil Kumar Modi Ji,

I write this letter with extreme disappointment.

I am disappointed to know that you both have chosen to not contest in the ensuing Bihar election. I am sure a lot of Biharis share this feeling.

Nitish Ji, you have been the Chief Minister of the State for the last 10 years and claim that it has progressed considerably under your rule. You also claim that the election will be fought on the issue of development. Why then such an aversion to contest election and put yourself to the scrutiny? You are considered to be one of the popular leaders in Bihar and remain the most preferred CM choice (going by media reports). Is it not a great disservice to the institution of popular democracy by becoming Chief Minister (which you will in case the Mahagathbandhan forms the government) via the route of Legislative Council? For a leader of a party that is going to contest only 101 seats in the State, a lack of time is an indefensible argument.

August 24, 2015

कलाम : सच्चे पथप्रदर्शक मित्र

27 जुलाई, 2015 की शाम! रोजाना की तरह छोटे भाई का फ़ोन आया. अमूमन बातचीत की शुरुआत एक दुसरे का हाल-चाल जानने से होती थी. मगर उस दिन फ़ोन उठाते ही आवाज़ आई, भैया एपीजे अब्दुल कलाम का देहावसान हो गया. वे शिलांग में भाषण देते वक़्त गिर पड़े और अस्पताल ले जाने के कुछ ही समय बाद चिकित्सकों ने उनकी मौत की पुष्टि कर दी.यह जानकर सदमा सा लगा. पहले से ही बीमार शरीर से पस्त पड़ा था, खबर सुनते ही लगा, कोई बेहद अज़ीज़ साथ छोड़कर अचानक चला गया. कमोबेश यही हाल उस हर हिन्दुस्तानी का था, जिसके ह्रदय में हमेशा कलाम नाम सुनते ही एक रचनात्मक तरंग की प्रवाह प्रवाहित होने लगती थी. न जाने लाखों चेहरे उस व्यक्ति के खोने के गम में गमगीन हो गया, जो उसे आजीवन अपने व देश की बेहतरी के लिए सदैव सपने देखने और कर्म करने को प्रेरित करता रहा. जाति, धर्म, क्षेत्र के परे वे तमाम लोग उदास थे, जिसे डॉ. कलाम ने अपने व्यक्तित्व व कृतित्व से जीवन की तमाम दुश्वारियों के बावजूद सफलता के चरमोत्कर्ष पर पहुँचने की सिख दी. किसी ने खूब लिखा, वे मरे तो लोगों के आँखों में आंसू थे लेकिन तालियाँ बजी- वाह रे भारत माता के लाल! क्या शानदार जीवन जिया!

April 17, 2015

मुजफ्फरपुर : चंपारण आंदोलन का प्रवेश द्वार

आज का दिन ऐतिहासिक है। .... 17 अप्रैल 1917 को गांधी जी चंपारण पहुंचे थे. दक्षिण अफ्रीका से लौटने के 2 वर्ष पश्चात हुआ यह आंदोलन चंपारण सत्याग्रह के नाम से इतिहास के पन्नों में दर्ज हुआ. अफसोस इस आंदोलन में मुजफ्फरपुर और विशेषकर एल एस कॉलेज के योगदान के इतिहास को इतिहासकारों ने तवज्जों नहीं दी, न ही इसे उचित स्थान मिल सका. इतिहास गवाह है कि गांधी 10 अप्रैल को मुजफ्फरपुर राजकुमार शुक्ल के साथ पहुंचे जहाँ ड्यूक हॉस्टल के छात्र अपने वार्डन आचार्य जे बी कृपलानी के नेतृत्व में आगवानी के लिए स्टेशन आये थे । गांधी को बघ्घी पर खींचकर विद्यार्थी हॉस्टल तक ले गए, वही वे रात में रुके। कृपलानी जी को इसी वजह से अंग्रेजी सरकार ने निष्काषित कर दिया। डॉ राजेंद्र प्रसाद व कृपलानी जी दोनों ने अपनी अपनी किताबों में इन घटनाओं का जिक्र विस्तार से किया है. पिछले दिनों 98 वर्ष पूर्व की यादों को पुनर्जीवित करने की सफल कोशिश कॉलेज प्रशासन ने किया।  उसकी कुछ झलकियाँ अख़बारों के जरिये आप भी देखे, पढ़े