December 28, 2019

आप सरकार का फर्जी रिपोर्ट कार्ड


दिल्ली में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केजरीवाल सरकार का एक रिपोर्ट कार्ड जारी किया है बीते 5 सालों में दिल्ली सरकार की प्राथमिकता में शिक्षा रही है। यह बात रिपोर्ट कार्ड में पहला स्थान शिक्षा को देने से स्पष्ट भी होता है लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में सरकार की जो उपलब्धियां रिपोर्ट कार्ड में बताई गई है, वह झूठ का पुलिंदा मात्र है।

कायदे से आम आदमी पार्टी को अपने उन चुनावी वायदे का हिसाब किताब देना चाहिए था, जिसे सामने रखकर वह प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई थी । लेकिन उन वायदों को भूल भ्रमित करने वाले तथ्य जनता के सामने परोसे जा रहे है। 

आप ने 2015 के चुनाव के समय 500 नए सरकारी स्कूल खोलने, दिल्ली के सभी निवासियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने, 17000 शिक्षकों की बहाली करने और शिक्षा के लिए बजट बढ़ाने के वादे किये थे। 

शिक्षा को लेकर किया वादा (संदर्भ: आप घोषणापत्र, 2015 विधानसभा चुनाव) 

बजट छोड़कर एक भी वायदा पूरा नही हुआ। लेकिन जिस बढ़े शिक्षा बजट को लेकर आम आदमी पार्टी और दिल्ली सरकार अबतक समाचारों की सुर्खियां बटोर रही है, उसमें भी तथ्यों के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ किया गया है।

आप-प्रेमी फैक्ट चेक वेबसाइट तो बात नही करेंगे, सरकारी आंकड़ों और उपलब्ध जानकारियों के माध्यम से समझते है कि आप ने अपनी रिपोर्ट कार्ड में क्या बताया और उसकी असलियत क्या है!

शिक्षा क्षेत्र में 5 साल के किये काम पर 24 दिसंबर 2019 को जारी रिपोर्ट कार्ड  

    


बात पहले बजट की करते है

आप के नेता यह कहते नही थकते कि शिक्षा को लेकर दिल्ली का बजट सबसे अधिक है और ऐसा पहले किसी सरकार में कभी नहीं हुआ। 

सच्चाई यही है कि भारत के इतिहास में दिल्ली कोई इकलौता राज्य नहीं है जिसने शिक्षा पर अपने बजट का एक चौथाई हिस्सा आवंटित किया है। बीते एक दशक के आंकड़ों को देखे तो कई ऐसे राज्य है जिन्होंने शिक्षा के लिए अपने कुल बजट का 20 से 30 फीसदी तक आवंटित किये हैं। असम ने तो वर्ष 2000-01 में 25.5 फीसदी शिक्षा के लिए आवंटित किये थे। मेघालय जैसे छोटे से राज्य ने वर्ष 2014-15 में अपनी बजट का 27.8 फीसदी शिक्षा के लिए आवंटित किया। 

असलियत तो ये है कि दिल्ली में हमेशा शिक्षा के लिए अधिक बजट आवंटित करने का जो ट्रेंड पिछली सरकारों ने शुरू किया, आप सरकार उसी पदचिन्हों पर चल रही है। आंकड़ों को देखे तो दिल्ली का बजट वर्ष 2000 से लेकर अब-तक औसतन 15 फीसदी से हमेशा अधिक ही रहा है, जो देश के कई राज्यों से काफी अधिक है।

                    बजट के मामले में यह समझना भी जरुरी है कि दिल्ली शिक्षा पर इसलिए भी अधिक खर्च कर सकने में समर्थ है क्योंकि दिल्ली के पास धन अधिक है, वही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र होने की वजह से खर्च करने का क्षेत्र सिमित। वर्ष 2018-19 में दिल्ली का प्रति व्यक्ति आय 365529 है, जो कि राष्ट्रीय औसत 125397 से 3 गुना अधिक है। दिल्ली का राजस्व अधिशेष (रेवेन्यू सरप्लस) भी 2017-18 के दौरान 4,913 करोड़ था। वही देखा जाए तो देश के कई बड़े राज्य भारी कर्ज में डूबे है, जिनकी आय से कई गुना अधिक उनका खर्च रहता है।


केजरीवाल सरकार ने शिक्षा बजट की राशि को बढ़ता हुआ दिखाया लेकिन खर्च करने के मामले में हमेशा फिसड्डी रही है। 2008 से 2013 तक के ही आंकड़े देखे तो यह जानकर आश्चर्य होगा कि कांग्रेसनीत शीला सरकार ने जहाँ आवंटित बजट का औसतन 98 फीसदी खर्च किया, वही केजरीवाल सरकार किसी भी वित्तीय वर्ष में इस आंकड़े के आस-पास भी नही पहुंच पाती है। बात केवल शिक्षा की ही करे तो दिल्ली सरकार ने शिक्षा के लिए आवंटित बजट का 2014-15 में 62 फीसदी, 2015-16 में 57 फीसदी, 2016-17 में 79 फीसदी ही खर्च कर पायी, बाकी के पैसे खर्च ही नहीं हुए।(पढ़े इंडिया स्पेंड की रिपोर्ट) कुछ यही हाल बीते दो वर्षों में भी देखने को मिला है।

यहां ध्यान देने वाली बात है कि शिक्षा के लिए आवंटित बजट की कुल राशि में स्कूली शिक्षा के साथ उच्च शिक्षा भी शामिल है। शिक्षा पर कुल खर्च उतना नही है, जितना बताने की कोशिश हो रही है  
शिक्षा पर हुआ कुल खर्च दिखाए जाने वाले आंकड़ों से इतर है ( Source- Delhi Planning)

अगर आंकड़ों की बात करें तो सामान्य शिक्षा के जुड़ी योजनाओं के लिए वर्ष 2017-18 के बजट में 2970 करोड़ खर्च करने का प्रावधान किया गया था, लेकिन वास्तविकता में खर्च 2374.75 करोड़ ही खर्च हुए। वही तकनीकी शिक्षा के लिए जहां बजट में 363 करोड़ का प्रावधान किया गया था, उसमे से मात्र 193.36 करोड़ ही खर्च हुए। उच्च शिक्षा की बात केजरीवाल सरकार अमूमन कम करती है, स्कूली शिक्षा में क्रांति के उसके दावे होते है लेकिन जब प्राथमिक शिक्षा के लिए आवंटित बजट की स्थिति देखे तो डायरेक्टरेट ऑफ एजुकेशन को जहां 2018-19 के बजट में 2127 करोड़ आवंटित किये गए थे, खर्च केवल 1677.46 करोड़ ही हुए। ऐसी ही स्थिति उच्च शिक्षा के लिए आवंटित बजट में भी देखने को मिलती है। उच्च शिक्षा के लिए 483 करोड़ आवंटित हुए, जबकि इसमें से 337.28 करोड़ ही खर्च हुए। इसके साथ ही बजट प्रस्तुत करते समय बजट अनुमान और संशोधित अनुमान के आंकड़ों में काफी अंतर देखने को मिला है। 

शिक्षा पर हुए खर्च की जानकारी (वित्तीय वर्ष 2017-18)  

                       दिल्ली के शिक्षा बजट देखने में भले तीन गुना हो गया हो लेकिन सच्चाई तो यही है कि यह राज्य के कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद (ग्रॉस स्टेट डोमेस्टिक प्रॉडक्ट यानी GSDP) का 2 फीसदी भी नहीं है। वर्ष 2018-19 में शिक्षा के लिए आवंटित बजट को ही माने तो शिक्षा पर जीएसडीपी का मात्र 1.53% ही खर्च हो रहे है। अगर इसे पिछले सरकार के आंकड़ों से तुलना करें तो 2013-14 में दिल्ली ने अपने कुल GSDP का जहाँ 1.29 फीसदी शिक्षा के लिए आवंटित किये, वहीं 2017-18 तक केवल 0.15% की ही बढ़ोतरी हुई। यानी दिल्ली की जितनी आर्थिक क्षमता बढ़ी उस हिसाब से शिक्षा के लिए आवंटित यह बजट मात्र आंकड़ों की बाजीगरी से इतर कुछ भी नहीं है। देश की जीडीपी के 6% खर्च करने के पैरोकार अरविंद केजरीवाल और उनके साथी राज्य के जीएसडीपी के 2% के भी आंकड़े को नही छू सकें है, यह बात बड़ी चालाकी से छुपा लेते हैं।




नए क्लासरूम

7 मार्च 2017 को विधानसभा में दिए अपने भाषण में शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा था कि 8000 कमरों का काम लगभग पूरा हो गया, आगामी वित्तीय वर्ष में 10000 नए कमरे बनाने का काम शुरू कर लिया जाएगा।

लेकिन आप की आधिकारिक वेबसाइट कुछ और हकीक़त बता रही है। लगभग 6 माह बाद यानी 7 अक्टूबर 2017 को आम आदमी पार्टी की वेबसाइट द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक दिल्ली के स्कूलों में केवल 5695 कमरे बने थे। मतलब विधानसभा में भी दिल्ली के शिक्षा मंत्री ने झूठ बोला।


जब 2018-19 का इकॉनोमिक सर्वे आया तो पता लगा 8095 कमरे ही बने है। 

लेकिन ठीक 2 महीने बाद जब लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी ने घोषणापत्र जारी किया तो बनने वाले क्लासरूम की संख्या 8213 बताए 

चलो यहाँ तक ठीक है 8000 कमरे बन गए 

लेकिन अब रिपोर्ट कार्ड के जरिये ये दावा किया जा रहा है कि सरकार ने 20000 कमरे बना लिए तो उसकी सच्चाई क्या है, किसी को नही मालूम है क्योंकि लगातार भ्रामक आंकड़े सरकार और पार्टी की ओर से दिए जा रहे है।

28 जनवरी, 2019 को केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के कोने-कोने में विज्ञापन देकर बताया कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 11000 नए कमरे बनाने का शिलान्यास हो रहा है तो 1000 कमरे नए कमरे अलग से बनने की प्रक्रिया कब शुरू हुई?  



यही नही, दिल्ली सरकार ने 4 साल में 8000 नए कमरे बनाये तो यह बताया ही नही कि इसमें से बच्चों के बैठने वाले क्लासरूम कितने है और बाकी काम के लिए कितने! वही जब आम आदमी पार्टी ने दावा किया कि ये कमरे उसने केंद्र सरकार के तमाम रुकावटों के बावजूद बनाए हैं फिर यह शक होना लाजमी है कि जो सरकार 4 साल में 25फीसदी बजट के बावजूद केवल 8000 कमरे ही बनवा पाती हो, वह अगर नवंबर 2019 तक 12000 और नए बनाने के दावे करें तो लगता है बड़ी बेबाकी से दिल्ली की जनता से सफ़ेद झूठ बोले जा रहे है!

यहाँ यह भूलना उचित नही होगा कि इन नए कमरों के बनाने में भ्रष्टाचार के आरोप लगे है सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी यही बताती है कि नए कमरों को बनाने में कुछ तो गड़बड़ किया गया है. भाजपा के आवेदन पर इस पर जाँच भी चल रही है. (पढ़े क्लासरूम घोटाले की ख़बर) . 

ऐसा लगता है कि नए कमरे बनाने के नामपर पर्दा के पीछे खेल चल रहा। आखिर जब सरकार के आंकड़ों में 11000 नए कमरे बनने की बात हो रही है, फिर अतिरिक्त 1000 कमरे कहाँ, कब और कैसे बनाये गए, यह बात कब सार्वजनिक रूप से बताई गई सवाल यह भी अनुत्तरित है कि नए कमरे बनाने से 500 नए स्कूल बनाने के वादे से आम आदमी पार्टी क्यों मुकर गई! सरकार की यह मंशा भी बेहद खतरनाक है, जहाँ वो नए स्कूल खोलने की वजाए, नए कमरे बनाकर सुबह और शाम की शिफ्ट में चलने वाले स्कूलों को एक शिफ्ट में करने की योजना पाले आगे बढ़ रही है यह हुआ तो भीड़ में न तो पढ़ाई होगी, न ही शैक्षिक गुणवत्ता बचेगी शिक्षकों और प्राचार्यों के पद खत्म तो होंगे ही

बारहवी के रिजल्ट

आप सरकार और उनके समर्थकों द्वारा एक और झूठ फैलाया जाता है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने पहली बार प्राइवेट स्कूलों को भी पछाड़ दिया है। 12वीं के परीक्षा परिणामों का संदर्भ देते ऐसे लोग खूब नज़र आते है। अपनी रिपोर्ट कार्ड में भी इसका जिक्र उपलब्धि बताते हुए शामिल की गई है। लेकिन जब बात 10 वीं के परीक्षा परिणामों की होती है तो बेतुके दलीले देकर सब चुप्पी साध लेते है। हालत ये है कि दिल्ली के स्कूलों का परिणाम 2006-07 के अपने सबसे निचले स्तर 77.12 फीसदी से भी नीचे है। source 


बात पहले 12वीं के परिणामों की! पहली बार यह सुनना बहुत अच्छा लगता है कि सरकारी स्कूल प्राइवेट से भी बेहतर परिणाम ला रहे है लेकिन दिल्ली के मामले में क्या ये पहली बार हो रहा है? मालूम चलेगा नही।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने पहले भी प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा है। 2009 और 2010 में सरकारी स्कूलों का 12वीं में प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से बेहतर था। 

ये भी कहना अतिरेक है कि परीक्षा परिणाम में सुधार केवल आप की सरकार बनने के बाद हुए। आंकड़े बताते है कि दिल्ली के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के परीक्षा परिणामों के गैप पहले के मुकाबले बेहद कम हुए है। 2005 में सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच 13 अंकों का फासला था। तब सरकारी स्कूलों में 12वीं में पढ़ने वाले बच्चों का परिणाम 76.44 फीसदी  थावही प्राइवेट स्कूलों के बच्चों का परिणाम 89.47 फीसदी था। कभी 13 अंक से पिछड़ने वाले दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों की न केवल बराबरी कीबल्कि उसे पछाड़ा भी। बीते 3 साल से यही दुहराया जा रहा है लेकिन सरकारी और प्राइवेट के बीच का फासला बहुत अधिक का नही है जैसा बीते दशकों में था।



2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी 85% से कम नही हुआ। पिछले 3 सालों में अगर मामूली बढ़त हुई भी है तो उसी अनुपात में प्राइवेट स्कूलों का भी परिणाम सुधरा है। इस सत्र यानी 2018-19 में सरकारी स्कूलों का आंकड़ा 94 फीसदी था तो प्राइवेट स्कूलों के आंकड़े भी 90 फीसदी से ऊपर थे।

एक बेहद चौंकाने वाली बात यह है कि बीते दो दशकों में परीक्षा परिणाम भले ही चाहे जैसा आये, परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या हमेशा बढ़ती रही है। जहाँ 1998-99 में 44918 बच्चें 12वीं की परीक्षा में बैठे थे, वही यह संख्या बढ़ते बढ़ते 2014 में 166257 बच्चों तक पहुँच गई। लेकिन जैसे ही आप सरकार में आई, परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या हर साल घटते गई। हालत ये थी कि वर्ष 2018 में बैठने वाले बच्चों की संख्या 112826 हो गई। ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि जब दिल्ली की जनसँख्या बढ़ रही है, स्कूल वर्ल्डक्लास बन चुके है, फिर बच्चों की संख्या कम क्यों हो रही है?



कहा जाता है कि 12वीं के परीक्षा परिणाम बेहतर करने के लिए हर साल 9वीं एवं 11वीं की परीक्षा में बड़ी संख्या में बच्चों को फेल किया जा रहा है ताकि केवल अच्छे बच्चें ही 12वीं की परीक्षा दे सकें। हर साल परीक्षार्थियों की घटती संख्या इसकी गवाही देते है। उपलब्ध आंकड़े बताते है कि हर साल लगभग आधे बच्चों को 9 वीं में फेल कर दिया जाता है, वही 11वीं कक्षा में भी एक तिहाई बच्चों की छंटनी कर दी जाती है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट पढ़े -





यहाँ यह भी देखना पड़ेगा कि जहाँ सरकारी स्कूलों में बच्चें कम हो रहे है, वही हर साल प्राइवेट स्कूलों में बच्चें बढ़ रहे है। प्राइवेट स्कूलों में कुल नामांकन का शेयर भी दिल्ली में बढ़ता जा रहा है। सरकार द्वारा जारी की गयी इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट के आंकड़े इसकी गवाही देते है। इसके मुताबिक 2014-15 में जहाँ प्राइवेट स्कूलों का शेयर 31 फीसदी था, वह 2017-18 में 45.5 फीसदी हो गया।



10वीं के ख़राब परिणाम का ठीकरा किसी और पर फोड़कर बड़ी चालाकी से अपनी नाकामी छुपाने में यह सरकार कायम रही है। न तो विपक्ष ने कभी इसे मुद्दा बनाया, न मीडिया ने। हालत यह है कि इस वर्ष यानी 2018-19 में प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले दिल्ली के सरकारी स्कूल 21 अंक पीछे रहे है। जहाँ दिल्ली के सरकारी स्कूलों का सामूहिक प्रतिशत 71.58 फीसदी  था, प्राइवेट स्कूलों का परिणाम 93.12 फीसदी। पिछले सत्र यानी 2017-18 में 10वीं परिणाम जब आये तो जहाँ सरकारी स्कूलों के 69.32 फीसदी बच्चें पास हुए थे, प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के 89.45 फीसदी ही पास हो सके थे। बीते दो सालों में 10वीं की परीक्षा में दिल्ली के स्कूल राष्ट्रीय औसत से भी काफी कम  परिणाम दे रहा है, इसके बावजूद इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई आगे नही आ रहा।

दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 10वीं के रिजल्ट की हालत एक दशक पहले भी ऐसी नही थी। इसे ख़राब स्थिति में लाने का श्रेय आप सरकार को जाता है, जहाँ दिल्ली का प्रदर्शन पिछले एक दशक का भी रिकॉर्ड तोड़ अपने सबसे निम्नतम स्तर पर आ गया है। सरकारी और प्राइवेट के बीच के निगेटिव फासले को वर्ष 2001-02 के -45 अंकों से जो सरकार +1.17 में ले आई थी, 2013 में जिसने प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ने का काम किया था, आप सरकार की नीतियाँ उसे दुबारा -21 में ले आई। प्राइवेट और सरकारी के बीच के गैप को पाटने में जो मेहनत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आप की सरकार बनने से पहले हुई थी, उसे चौपट करने की जिम्मेवारी दिल्ली सरकार को लेनी ही चाहिए। यह हालत तब है जबकी पिछले 4 सालों से लगातार 42 फीसदी से अधिक बच्चें 9वीं की परीक्षा में फेल हो रहे थे यानी बेहतर बच्चें ही अगली कक्षा में भेजे गए फिर भी परिणाम नही सुधरा।

सबसे बड़ी बात है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में उन बच्चों को दुबारा नामांकन नही लेने दिया जा रहा, जो फेल हो गए थे। पिछले सत्र यानि 2017-18 में ऐसे बच्चों की संख्या 66 फीसदी थी।

कहना गलत नही होगा कि रिपोर्ट कार्ड के जरिये केजरीवाल सरकार अपनी नाकामी तो छुपा ही रही है, रिपोर्ट कार्ड ये भी साबित करता है कि पार्टी अपने चुनावी वायदे को भी पूरा करने में असफल रही है। न तो स्कूल खुले, न नामांकन बढ़े, न परिणाम सुधरे, न शिक्षक बहाल हुए। बस गिने-चुने स्कूलों में करोड़ों लुटाकर और उनकी तस्वीरें दिखाकर यह बताने की कोशिश हो रही है कि शिक्षा में क्रांति आ गई है और दिल्ली के सरकारी स्कूलों का कायापलट हो गया है। 

दरअसल आप की शिक्षा क्रांति, उस खुबसूरत सी दिखने वाली रंगीन बैलून की तरह है, जो बाहर से देखने में मनभावन तो लगती है लेकिन अंदर से बिल्कुल खोखला है। प्रचार तंत्र के साए में वाहवाही बटोरने वाली ये बैलून जब फूटेगी तो शिक्षा के क्षेत्र में कुछ बदल जाने की आस पाले कईयों के भरोसे टूटेंगे। फिलहाल दिल्ली के गरीब लोगों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा एक स्वप्न की तरह ही है।



(नोट- परीक्षा परिणामों के आंकड़े http://www.edudel.nic.in/Result_Analysis से लिए गए है)

November 22, 2019

बुनियादी विद्यालय: ग्रामीण शिक्षा को बचाने का गांधीवादी विकल्प





गाँधी और बिहार...ये दो शब्द जब ध्यान आते है तो निलहों के विरूद्ध हुए चंपारण आंदोलन का जिक्र जरुर होता है। लेकिन चंपारण आंदोलन केवल निलहों के अन्याय के विरूद्ध संघर्ष तक सिमित नही था। 15 अप्रैल 1917 को जब  गाँधी चंपारण के इलाके में गए तो उनका सामना राजनीतिक गुलामी के साथ साथ अशिक्षा,गरीबी, गंदगी से भी हुआ। गाँधी के शब्दों में कहे तो लोगो का अज्ञान दयनीय था। गााँवो के बच्चे मारे-मारे फिरते थे अथवा माता-पिता दो या तीन पैसे की आमदनी के लिए उनसे सारे दिन नील के खेतो में मजदूरी करवाते थे।

गाँधी ने स्थिति को भांपते हुए राजनीतिक सत्याग्रह के साथ साथ ग्रामीण बदहाली के जिम्मेवार अशिक्षा और गंदगी को भी समाप्त करने का प्रयास शुरू किया। इसके लिए उन्होंने इस क्षेत्र में स्कूल खोलने की योजना बनाई। गाँधी ने पहले 6 गांवों में स्कूल खोलने का निश्चय किया लेकिन उनकी शर्त थी कि उन गांवों के मुखिया मकान और शिक्षक का भोजन व्यय दे, उसके दुसरे खर्च की व्यवस्था हम करें। आर्थिक तंगहाली से गुजर रहे लोगों ने पैसों की वजाए कच्चा अनाज देने को तैयार हो गए । जब बात आई कि इन स्कूलों में शिक्षक कैसे हो, इस विषय पर गाँधी की सोच थी कि साधारण शिक्षकों के हाथों में बच्चों को कभी न छोड़ना चाहिए । शिक्षक को अक्षर-ज्ञान चाहे थोड़ा हो पर उसमें चरित्र बल तो होना ही चाहिए इसके लिए उन्होंने स्वयंसेवकों की मदद ली।

13 नवंबर 1917 को मोतिहारी के बरहरवा लखनसेन में एक ग्रामीण के दिए ज़मीन पर गाँधी ने पहले स्कूल की बुनियाद रखी। उनके अनुयायी पेशे से इंजीनियर बबन गोखले ने उस स्कूल की व्यवस्था संभाली गोखले की पत्नी अवंतिका बाई गोखले और गाँधी के सबसे छोटे बेटे देवदास गांधी विद्यालय में पठन-पाठन की जिम्मेदारी सँभालते थे। बाद में 20 नवंबर 1917 को पश्चिम चंपारण के भितिहरवा में भी एक विद्यालय की स्थापना हुई जहाँ ज़मीन एक मंदिर के साधू ने उपलब्ध कराई थी। विद्यालय को चलाने की जिम्मेदारी सँभालने वालों में गाँधी की पत्नी कस्तूरबा भी थी। एक और विद्यालय की स्थापना 17 जनवरी, 1918 को मधुबन में हुई।

गाँधी बुनियादी शिक्षा के अपने सोच के प्रति बहुत गंभीर भी थे चंपारण से जाने के बाद भी वे बुनियादी शिक्षा की अपनी सोच के साथ बने रहे और उसे सार्वजनिक मंचों पर साझा करते रहे। कांग्रेस के 1935 के वर्धा सम्मलेन में भी बुनियादी विद्यालय की वकालत करते गाँधी दिखे थे बुनियादी शिक्षा से जुड़ी उनकी सोच को आगे बढ़ाती ज़ाकिर हुसैन समिति की रिपोर्ट 1938 में प्रकाशित हुईउसी वर्ष हरिपुरा कांग्रेस में इस मॉडल को अपनाने पर चर्चा भी हुई कांग्रेस शासित 7 प्रदेशों ने इस विचार को अपनाने की प्रक्रिया शुरू की, जिसमें बिहार सबसे अग्रणी था

बिहार में दिसंबर, 1938 में बिहार बेसिक एजुकेशन बोर्ड तत्कालीन शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में बनाया गया 7 अप्रैल, 1939 को गाँधी जब दुबारा चंपारण की धरती पर आये तो अपने हाथों से पश्चिमी चंपारण के बृन्दावन में बुनियादी स्कूल की नीवं रखी बाद के दिनों में कई और बुनियादी विद्यालय खुले ऐसे विद्यालय महात्मा के स्कूल के रूप में प्रचलित भी हुए आज बिहार में ऐसे 391 विद्यालय है, जिनमें अकेले पश्चिमी चंपारण में ही 43 है

बिहार में ही उपेक्षित है बुनियादी स्कूल

आज़ादी के लगभग 10 वर्ष बाद ही बुनियादी स्कूलों की उपेक्षा शुरू हो गई। प्रथम पंचवर्षीय योजना में गाँधी के शिक्षा मॉडल पर काम करने का जिक्र तो था लेकिन उसे अमल में नही लाया गया। शायद गाँधी को ये एहसास पहले हो गया था. वे अपनी आत्मकथा में लिखते है कि मुझे खेद के साथ कहना पड़ता है कि इस काम को स्थाई रूप देने का मेरा मनोरथ सफल न हो सका। जो स्वयंसेवक मिले थे, वे एक निश्चित अवधि के लिए ही मिले थे। दुसरे नए स्वयंसेवकों को मिलने में कठिनाई हुई और बिहार से इस काम के लिए योग्य सेवक नही मिलें. गाँधी लिखते है कि मैं कुछ समय तक चम्पारण नहीं जा सका और जो पाठशालाएं वहां चल रही थीं, वे एक-एक कर बंद हो गईं। साथियों ने और मैंने कितने हवाई किले रचे थे पर कुछ समय के लिए तो वे सब ढह गए। मैं तो चाहता था कि चम्पारण में शुरू किए गए रचनात्मक काम को जारी रखकर लोगों में कुछ वर्षों तक काम करूं, अधिक पाठशालाएं खोलूं और अधिक गांवों में प्रवेश करूं। क्षेत्र तैयार था। पर ईश्वर ने मेरे मनोरथ प्रायः पूरे होने ही नहीं दिए। मैंने सोचा कुछ था और दैव मुझे घसीट कर ले गया एक दूसरे ही काम में।

बिहार में 70 के दशक आते आते सरकार नीजी स्वामित्व वाले प्राथमिक और मिडिल स्कूलों के अधिग्रहण में लग गई तो ऐसे स्कूल और उपेक्षित हो गए केवल कागजों में बिहार बेसिक एजुकेशन बोर्ड कायम रहा इनमें होने वाली नियुक्ति और सेवा शर्तें भी अलग ही रही 1968 में बिहार सरकार ने सयेद्दीन समिति की सिफारिशों को मानते हुए बेसिक एजुकेशन स्कूल को सामान्य स्कूल एजुकेशन व्यवस्था के साथ सम्मिलित कर दिया और यहाँ भी बाकी स्कूलों के पाठ्यक्रम लागू कर दिए गए 16 मार्च 1972 से सरकार के अधीन आये सभी बुनियादी स्कूलों में एकीकृत पाठ्यक्रम कक्षा 1 से लेकर 8 तक में लागू कर दिए गए बुनियादी स्कूलों की सरकारी उपेक्षा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 7 मार्च 1979 से लेकर 1 नवंबर 1991 तक बेसिक एजुकेशन बोर्ड की कोई भी बैठक शिक्षा मंत्री की अध्यक्षता में आयोजित नही हुई इस अवधि के बाद भी कोई और बैठक हुई, इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है

एकीकृत बिहार में 518 बुनियादी स्कूल थे, जिनके पास 2500 एकड़ ज़मीने थे यानी प्रति स्कूल लगभग 5 एकड़ इसके अलावा इन विद्यालयों में बड़ी संख्या में कक्षा-कक्ष, शिक्षकों के आवासीय परिसर, तालाब, पेड़, कृषि कार्य करने के औजार सहित अन्य संपत्तियां थीवर्ष 2000 में जब बिहार बंटवारा हुआ तो बिहार के हिस्से में 391 बुनियादी विद्यालय आये इसमें अकेले पश्चिमी चंपारण में ही 43 स्कूल है

आज बिहार में बेसिक एजुकेशन बोर्ड को खत्म करने का कोई आदेश नही है, लेकिन बोर्ड का कोई अस्तित्व नही दीखता बोर्ड के अधिकारीयों और कर्मचारियों को दुसरे विभाग में भेज दिया गया सरकार द्वारा बुनियादी विद्यालयों की स्थिति सुधारने की कोशिश भी हुई 1999 से 2004 के बीच दो समिति भी बनी कि बेसिक एजुकेशन बोर्ड को रहने दिया जाए या खत्म कर दिया जाए मगर किसी ने कोई रिपोर्ट नही सौंपी

जब 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी तो मुचकुंद दुबे की अध्यक्षता में 10 सितंबर 2006 को एकसमान विद्यालय प्रणाली पर एक कमिटी बनाई गई, जिसने 8 जून 2007 को रिपोर्ट सौंपी थीमुचकुंद दुबे समिति ने अपनी तमाम सिफारिशों के साथ साथ बुनियादी विद्यालयों को फिर से पुनर्जीवित करने से जुड़े कई सुझाव सरकार को सौंपे

समिति का मानना था कि जिन सिद्धांतों को लेकर इन बुनियादों विद्यालयों की स्थापना हुई थी, उसे हुबहू लागू करना मुश्किल है लेकिन उत्पादक कार्य को शिक्षण-शास्त्रीय माध्यम के रूप में ज्ञान अर्जित करने, मूल्यों को विकसित करने, कौशल हासिल करने जैसे लक्ष्यों को गांधीवादी सिधान्तों के जरिये अपनाया जा सकता है। साथ ही सभी 391 स्कूलों को स्कूल लैब के रूप में विकसित कर इसे बाकी स्कूलों के लिए सीखने की जगह बनाई जा सकती है। अफ़सोस इस समिति के सिफारिशों पर अमल नही हुआ।

2012 में फिर से इन स्कूलों की एकाएक चर्चा शुरू हुई। बिहार सरकार ने इन स्कूलों को विकसित करने, शिक्षकों के खाली पद भरने और बुनियादी विद्यालय से इनका नाम कस्तूरबा विद्यालय करने की बात कही। ये सभी वादें आधे-अधूरे ही रहे। स्थिति ये है कि 1992-93 के बाद से आजतक कोई स्थाई नियुक्ति नही हुई है और अधिकांश स्कूल आज अस्थाई शिक्षकों के सहारे ही चल रहे है। शैक्षिक गुणवत्ता की बात करना तो यहाँ बेमानी ही है।

आज इन विद्यालयों के पास गाँधी की विरासत है, ज़मीने है। इसके अलावा यहाँ गाँधी नही दीखते, न दीखते है उनके स्वप्नों का बुनियादी विद्यालय। ये आज बाकी सरकारी स्कूलों की तरह ही हो गए


बुनियादी स्कूल के पीछे क्या थी गाँधी की सोच

शिक्षा के क्षेत्र में गतिविधि आधारित शिक्षण की बहुत बात होती है इस बात को गाँधी ने लगभग सौ वर्ष पहले महसूस किया 18 फरवरी 1939 को गाँधी हरिजन पत्रिका में लिखते है कि बच्चों के लिए मात्र पुस्तक-ज्ञान में इतना खिंचाव नही होता है कि वह हर समय किताब में ही घुसा रहे शब्दों को देख-देखकर दिमाग ऊब जाता है और बच्चे का मन इधर-उधर भटकने लगता है जो शिक्षा हमें भले और बुरे में फर्क करना नही सिखाती , भलाई को आत्मसात करना और बुराई से दूर रहना नही सिखाती है, वह शिक्षा गलत है बस नाम की शिक्षा है

उनकी सोच थी कि बुनियादी शिक्षा के तहत सीखने की विधि में समस्त विषयों की शिक्षा किसी कार्य या हस्तशिल्प के माध्यम से दिया जाए कृषिप्रधान देश में सीखने का जरिया कैसा हो, इस विषय पर गाँधी मानते थे कि सीखने की प्रक्रिया कृषि से जुड़े कार्य, कताई, बुनाई, लकड़ी- मिट्टी का काम, मछली पालन, फल और सब्जी की बागवानी तथा स्थानीय एवं भौगौलिक आवश्यकताओं के अनुकूल हस्तशिल्प से जुड़े हो

बुनियादी शिक्षा के संबंध में गाँधी दो बातें चाहते थे, पहला, ज्ञान को कार्य के साथ जोड़ा जाए जिससे विद्यार्थियों के दिमाग का समग्र और व्यवस्थित विकास हो सकें दूसरा, स्कूलों को उत्पादक कार्यों से होने वाली आय के जरिये आत्मनिर्भर बनाया जाए और इसके साथ साथ विद्यार्थियों के भी क्षमता संवर्धन का काम हो जिससे की वह आत्मनिर्भर होकर गरिमापूर्ण जीवन जी सकें

गाँधी के पहले विचार को 1944 में आई सार्जेंट रिपोर्ट में भी सराहा गया, लेकिन दुसरे सुझाव को अव्यवहारिक बताया गया जाहिर है अंग्रेज भी बुनियादी शिक्षा मॉडल से कुछ हद तक सहमत थे असहमति के विषय को गहराई में जाकर सोचे तो गाँधी ने इस बात को भांप लिया था कि शिक्षा सरकार का विषय होगा तो ग्रामीण शिक्षा की स्थिति नही सुधरेगी इसलिए शिक्षा सरकार का होकर समाज का विषय बने विद्यालय बच्चों की जरूरतों की चिंता समाज के साथ साथ विद्यालय-विद्यार्थी स्वयं एक व्यवस्था बनाकर करें  

गाँधी चाहते थे कि बच्चें केवल अच्छी शिक्षा प्राप्त करें बल्कि वह शिक्षा प्राप्त करते समय आस-पास की सामाजिक-आर्थिक गतिविधियों से भी रुबरु हो वह पढ़ लिखकर देश-समाज के अनुकूल कार्य करने की योग्यता और अनुभव प्राप्त कर सकें स्व-रोजगार के जरिये स्वाबलंबन का रास्ता चुनने में उसे कोई हिचकिचाहट हो समाज में पढ़ा-लिखा वर्ग भी शारीरिक श्रम से धन अर्जित करना अपमान अथवा स्वयं को निम्न श्रेणी का समझ उसमें सम्मान का भाव महसूस करें इसके साथ ही विद्यालय समाज के सहयोग, समाज की निगरानी और समाज के नेतृत्व में ही चले

गाँधी की सोच के पीछे भविष्य के भारत की वह छवि ही रही होगी, जहाँ एक तरफ ग्रामीण शिक्षा की हालत ख़राब होती दिख रही होगी, शहरीकरण गाँव के खालीपन का वजह बन रही होगी, वही दूसरी तरफ गाँव की समूची अर्थव्यवस्था चौपट होने के कगार पर होगी, गाँव को अपनी ही जरूरतों की पूर्ति के लिए शहरों की तरफ देखना पड़ रहा होगा और लोगों में शारीरिक श्रम करनेवाले लोगों को हेय दृष्टि से देखने की प्रचलन बढ़ रही होगी

एनसीईआरटी  के वर्ष 2007 में "वर्क एंड एजुकेशन" विषय पर बने राष्ट्रीय फोकस समूह ने भी मध्य-उच्च वर्गीय परिवारों के बच्चों में अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटने और वर्तमान शैक्षिक व्यवस्था द्वारा इस प्रक्रिया को बढ़ाने और तेज करने की समस्या को रेखांकित करते हुए इसे हल करने की आवश्यकता पर बल दिया था।

गाँधी की इस शैक्षिक योजना के पीछे पुश्तैनी पेशे के विचार को जबरदस्ती आगे बढ़ाने पर जोर देना नही था, बल्कि शारीरिक श्रम के प्रति सम्मान को बढ़ावा देना था आज गांवों में कितने लोग है जिन्होंने अपने पुश्तैनी पेशे को आज भी अपना रखा है? अनुभव बताता है कि लोग लगातर अपने पुश्तैनी पेशे को छोड़ रहे है छोड़ने के पीछे कई वजह है,लेकिन सबसे बड़ी वजह उस पेशे के प्रति समाज में बनी धारणा है जो कही कही असम्मान की सूचक है गाँधी ‘मेरे सपनों का भारत’ में युवाओं को दिशाबोध कराते हुए लिखते है कि हम लोगों को मौजूदा ग्राम-सभ्यता ही कायम रखना है और उसके माने हुए दोषों को दूर करने का प्रयत्न करना है। शारीरिक श्रम के साथ अकारण ही जो शर्म की भावना जुड़ गई है वह अगर दूर की जा सके तो सामान्य बुद्धि वाले हर एक युवक और युवती के लिए उन्हें जितना चाहिए उससे कहीं अधिक काम पड़ा हुआ है।

दुर्भाग्य है कि रोजगार का आधुनिक मॉडल लोगों को गाँव छोड़ शहर जाने पर मजबूर कर रही है, वही शिक्षा का आधुनिक मॉडल गाँव-समाज की जरूरतों और अपेक्षाओं की पूर्ति करने में नाकाम साबित हो रहा है। वैसे में जब शिक्षा व्यवस्था पढ़े-लिखे को गाँव से जोड़ने की वजाए उसे गाँव छोड़ने को मजबूर कर रही हो, गाँधी के 150 वीं जयंती वर्ष पर इस बुनियादी शिक्षा मॉडल को दुबारा नए सिरे से परखने और आजमाने की जरुरत है। 

अभिषेक रंजन 
(लेखक ग्रामीण शिक्षा क्षेत्र में बीते एक दशक से कार्य कर रहे है)