September 10, 2019

डूसू के चुनावी मैदान से क्यों गायब है आप




देशभर में चर्चित दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ की बिगुल बज चुका है। माना जा रहा है कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी मुख्य मुकाबला अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् (एबीवीपी) और भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) के बीच ही होगा। लेकिन सबसे हैरानी की बात है कि दिल्ली की राजनीति का केंद्र बिंदु बनी आम आदमी पार्टी की छात्र इकाई छात्र युवा संघर्ष समिति (सीवाईएसएस) और केजरीवाल दोनों इस बार पूरे परीदृश्य से गायब है।

2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप के 70 में से 67 सीट जीताने में बड़ी भूमिका युवाओं की थी। हैरानी स्वाभाविक है कि राजनीति में बदलाव के वादे के साथ बनी पार्टी दिल्ली में युवाओं के इस सबसे बड़े लोकतांत्रिक त्यौहार से खुद को क्यों अलग रख रही है!

पिछले वर्ष मिली थी करारी हार   

सीवाईएसएस की माने तो वह इसलिए चुनाव से खुद को अलग कर रही है क्योंकि मांगपत्र देने और कार्यकर्ताओं के अनशन पर बैठने के बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन बैलेट पेपर से चुनाव करवाने की उसकी मांग को नही मान रही। वे यह मानते है कि पिछले बार ईवीएम की धांधली की वजह से वे हारे।

पहली नज़र में तो ये फैसला राजनीतिक सूझ-बुझ और आदर्शवादिता की निशानी लिए लगता है। लेकिन गहराई में जाए तो सच्चाई यही है कि पिछले वर्ष के चुनाव में मिली करारी हार के सदमे से वह अब भी नही उभर पाई है। तब डूसू चुनाव में उसे एबीवीपी के हाथों करारी शिकस्त हासिल हुई थी। वामपंथी संगठन आइसा से गठबंधन करने के बावजूद न तो उसे किसी सीट पर जीत मिली, न ही वह मुख्य मुकाबले में भी कही दिखी। हालात तो ऐसे थे कि दिल्ली सरकार के तमाम मंत्रियों और रणनीतिकारों के दिन-रात एक करने के बावजूद उसके दोनों उम्मीदवारों को नोटा से भी कम मत मिले, वही गठबंधन  चारों पदों पर तीसरे स्थान पर रही। तब अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर आइसा का उम्मीदवार था, वही सचिव और संयुक्त सचिव पद पर खुद सीवाईएसएस ने अपने उम्मीदवार उतारे थे। चुनावी नतीजे ये बता रहे थे कि चारों पदों पर गठबंधन की लड़ाई एबीवीपी-एनएसयूआई की वजाए नोटा से ही हो रही थी। जहाँ गठबंधन को चारों पदों को मिलाकर 29506 मिले, वही नोटा को 27739 वोट मिले। सचिव और संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवारों को कुल 13781 वोट मिले, जबकि इन दोनों पदों पर नोटा को उससे अधिक 15083 वोट मिले थे। इस हार के बाद संगठन परिसर में निष्क्रिय हो गया।

DUSU चुनाव-2018 के समय प्रत्याशियों की वजाए केजरीवाल के ही पोस्टर दिखाई दिए 


साल अलग, बहाने अलग  

2016 और 2017 में भी सीवाईएसएस चुनावी मैदान से बाहर थी। लेकिन तब उसके बहाने कुछ और थे। 2015 के चुनाव में मिली हार के बाद ये कहा गया कि संगठन कमजोर है इसलिए हार गए। यही दलील 2016 में चुनाव न लड़ने की वजह एक वजह बनी, जिसमें डीयू प्रशासन द्वारा लिंगदोह समिति की सिफारिशों के अनुरूप निष्पक्ष चुनाव न कराने की मंशा भी शामिल था।  लेकिन तब भी सीवाईएसएस समर्थित विद्यार्थी कॉलेज चुनाव में उतरे थे। यही नही, जिस लिंग्दोह का बहाना बनाकर सीवाईएसएस चुनाव नही लड़ी थी, 2015 में वह खुद सारे नियमों को ताक पर रख येन-केन प्रकारेण चुनाव जीतने की कोशिशों में लगी थी। उस चुनाव में जीतने के लिए कई हथकंडे भी अपनाए गए थे, जिनमें वो फर्जी ओपिनियन पोल भी शामिल था जिसमें कुल मतों का 45% मिलने के दावें किये गए थे। यही हथकंडा उसने 2018 में भी अपनाया था नामी कलाकारों के केजरीवाल की मौजूदगी में डीयू रॉक कॉन्सर्ट आयोजित हुआ था, जिसको लेकर तब आप के वरिष्ठ नेता रहे प्रशांत भूषण ने अपनी नाराजगी व्यक्त की थी और ये कहा था कि लिंग्दोह समिति की सिफारिशों की धज्जियाँ उड़ाने में सीवाईएसएस सबसे आगे निकल गयी है।  यही नही डीयू में विद्यार्थियों से वोट देने की अपील करते केजरीवाल के बड़े बड़े होर्डिंग भी लगे थे। इसके बावजूद उसे कुल मतों का केवल 16% मिला।
DUSU चुनाव- 2015 में आप नेता सरेआम फर्जी ओपिनियन पोल दिखाकर वोट बटोरने की कोशिश करते नज़र आये 


जिस संगठन के कमजोर होने का बहाना बनाकर सीवाईएसएस 2016 और 2017 के चुनाव से बाहर रही, उसके प्रति वह 2018 में भी कोई ख़ास चिंतित नज़र नही आई। 2 साल निष्क्रिय रही और विद्यार्थी हितों के लिए किये तमाम वादें अधूरे रहे। जब चुनाव सर पर था तो फटाफट संगठन खड़ा करने की याद आई। तब दिल्ली विश्वविद्यालय में सीवाईएसएस की यूनिट 23 अगस्त 2018 गठित हुई थी, जबकि चुनाव ठीक 19 दिन बाद यानी 12 सितंबर 2018 को होने थे। पूरी ताकत बटोरकर डूसू की राजनीति में तीसरी शक्ति बने AISA से गठजोड़ करके चुनावी फतह की योजना बनाई गई। खूब बड़े बड़े वादें किये लेकिन विद्यार्थियों ने उसे पसंद नही किया। नतीजा ये रहा कि 2018 की हार 2015 से भी शर्मनाक रही। चुनावी मुकाबले में केजरीवाल सरकार के तमाम मंत्रियों की मेहनत भी काम नही आई और चारों पदों पर बुरी हार का सामना करना पड़ा।

चुनाव लड़ने के लिए हुआ था सीवाईएसएस का गठन

28 सितंबर 2014 को सीवाईएसएस की स्थापना ही इसलिए हुई थी कि आप की लोकप्रियता को भुनाया जाए ताकि छात्रों के बीच आप की अपनी मजबूत पकड़ हो। स्थापना के समय पार्टी के बड़े नेताओं की मौजूदगी में अरविन्द केजरीवाल ने तब कहा था कि यह संगठन दिल्ली विश्वविद्यालय व छात्र संघ चुनावों के अलावा अन्य युवा गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाएगी। छात्र इकाई अगले साल से छात्र संघ चुनावों में भी हिस्सा लेगी। हुआ भी ऐसा ही। आप के सभी बड़े नेता अपने इस नए नवेले संगठन के पैर ज़माने के मिशन में जुट गए। सरकार की सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2015 में जब डीयू के नए सत्र में कक्षाएं शुरू हुई तो पहले दिन विद्यार्थियों का स्वागत करने आप के विधायक अलग अलग कॉलेज परिसर में मौजूद थे। मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने काफी रूचि ली थी और सरकार की पूरी ताकत झोंक दी गयी थी। इसके बावजूद चारों पदों पर बुरी हार का सामना करना पड़ा। उपाध्यक्ष के पद पर दुसरे स्थान पर रहे, बाकी दो उम्मीदवार तीसरे, एक उम्मीदवार चौथे स्थान पर था। उपाध्यक्ष पद पर भी हार का अंतर काफी बड़ा था।
DU Rocks नाम से कॉन्सर्ट आयोजित किये गए ताकि युवा वोटरों को लुभाया जा सकें 


निष्क्रिय संगठन, वादों से मुकरने की मिली सजा

सीवाईएसएस की ऐसी हालत क्यों हुई, इसे जानने के लिए कुछ पहलुओं को समझना जरुरी है। संगठन केवल व्यक्तिगत लोकप्रियता के सहारे नही चलाई जा सकती। आप और उसके समर्थक संगठनों के लोगों को ये साधारण सी बात समझ नही आती। यही वजह रही है कि व्यक्ति केन्द्रित राजनीति ने 2015 के विधानसभा चुनावों के बाद किसी भी चुनाव में आप को सफलता नही दिला सकी है। वही दूसरी ओर चुनावी मौसम में सक्रियता सफलता की गारंटी नही बन सकती। वर्ष भर सक्रिय रहने वाले संगठन के मुकाबले सीवाईएसएस सत्ता के सहारे केवल चुनावी मौसम में नज़र आती है। बड़े वादे और उसपर अमल न करने की प्रवृति भी लोग पसंद नही करते।  

2018 की करारी हार का 2015 में किये वादों के साथ गहरा रिश्ता था। 2015 के अपने चुनावी वादें में विद्यार्थियों को फ्री वाई-फाई मुहैया कराने, मेट्रो किराये में आधे कमी करने, यू-स्पेशल बस चलाने, आम आदमी कैंटीन खोलने, डीटीसी बस पास पुरे साल के लिए मान्य करने जैसे वादें किये थे, जिसे दिल्ली सरकार आसानी से पूरा कर सकती थी। यही नही, किराए में बेतहाशा वृद्धि और मकानमालिकों से परेशान विद्यार्थियों के लिए भी कई लोकलुभावन वादें भी किये गए थे। मॉडल टेनैंसी एक्ट में डीयू स्टूडेंट्स का एक खंड जुड़वाने की बात की गयी ताकि बाहर से आने वाले विद्यार्थी, जो हॉस्टल की वजाए नीजी मकानों में रहते है, का घर अनायास खाली नही कराया जा सकें। सीवाईएसएस ने तब दिल्ली सरकार द्वारा दिल्ली स्टूडेंट पीजी एक्ट पास करने और रेंट पर रहने वाले विद्यार्थियों के बिजली-पानी के बिल माफ़ होने का सपना भी दिखाया था। लेकिन ऐसा कुछ भी नही हुआ। महिला सुरक्षा के लिए CCTV लगाने के वादे भी अमल में नही लाये गए। नतीजा गठबंधन के बावजूद छात्रों ने अपने वादों पर खरे नही उतरने की सजा दी और सीवाईएसएस को पूरी तरह नकार दिया।  


वामपंथियों से समझौता करना भी छात्रों को नही भाया। जिस तरह राष्ट्रीय मसलों पर आइसा का रुख रहता है, उससे बड़ी संख्या में डीयू के विद्यार्थी इत्तेफ़ाक नही रखते। आप समर्थकों का मानना था कि जब अकेले लड़कर 67 सीटें ला सकती है तो 2 साल बाद पूरी मजबूती से लड़ रही आप अकेले क्यों नही जीत सकती थी! तब कहा गया था कि आईसा के कैंपस राजनीति के अनुभव और आप सरकार के जरिये डीयू विद्यार्थी के हितों में काम करेगी। माना जाता है कि आप की छात्र इकाई और आइसा में गठजोड़ करवाने में आइसा के सदस्य रह चुके आप के वरिष्ठ नेता और दिल्ली सरकार में मंत्री गोपाल राय की बड़ी भूमिका थी। पिछले डूसू चुनाव के समय गोपाल राय काफी सक्रीय थे।

खैर चुनाव न लड़ने की वजह जो भी हो, दिल्ली में अगले वर्ष की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होने वाले है। ऐसे में वह नही चाहती कि चुनावी साल में आम आदमी पार्टी की एक और हार हो। डूसू चुनाव के मैदान से हटना इसी रणनीति का एक हिस्सा है। वैसे बैलेट पेपर को निशाना बनाकर डूसू चुनाव का बहिष्कार करने वाली आप  क्या विधानसभा चुनाव में भी यही तरीका अपनाएगी? क्या इवीएम से चुनाव होने की स्थिति में आप अपने छात्र इकाई की तरह चुनाव का बहिष्कार करेगी? देखना दिलचस्प होगा!   

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में कानून के छात्र है और डीयू के छात्र-संघ राजनीति में सक्रिय रहे है) 

May 10, 2019

क्या है सच दिल्ली के सरकारी स्कूलों के परीक्षा परिणामों की?

दिल्ली के सीएम केजरीवाल सहित आम आदमी पार्टी के सभी कार्यकर्त्ता और समर्थक यह कहते नही थकते कि आप के राज में शिक्षा क्रांति हो गयी. दिल्ली के सरकारी स्कूल वर्ल्ड क्लास हो गए. फिर वे करोड़ों खर्च कर दिल्ली के हजारों स्कूलों में से 1 में बनी जिम और 2 में बनी स्विमिंग पूल का फोटो दिखाकर कहते हुए पाए जायेंगे कि भई कमाल कर दिया दिल्ली में केजरीवाल जी ने.

आप सरकार और उनके समर्थकों द्वारा आजकल एक और झूठ बड़ी तेजी फैलाया जा रहा है- सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों को भी पछाड़ दिया है. 12वीं के परीक्षा परिणामों का संदर्भ देते ऐसे लोग नज़र आते है. लेकिन जब बात 10 वीं के परीक्षा परिणामों की करें तो सब चुप्पी साध लेते है. फिर कोई ये कोई नही बताता कि दिल्ली के स्कूलों का परिणाम 2006-07 में आये 77.12% के स्तर से भी नीचे क्यों चला गया? 2006-07 के बाद कभी भी दिल्ली का परिणाम विपरीत दिशा में जाता नज़र नही आया लेकिन बीते 2 वर्षों में रिकॉर्ड टूट गया.  

आईये समझते है क्या है दिल्ली के सरकारी स्कूलों की कहानी- 

पहले बात 12वीं की 

1) पहली बार यह सुनना बहुत अच्छा लगता है कि सरकारी स्कूल प्राइवेट से भी बेहतर परिणाम ला रहे है. लेकिन दिल्ली के मामले में क्या ये पहली बार हो रहा है?

मालूम चलेगा नही. 

दिल्ली के सरकारी स्कूल ने पहले भी प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा है. 2009 और 2010 में सरकारी स्कूलों का 12वीं में प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से बेहतर था. पढ़े सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के 12वीं परीक्षा परिणाम का ये आंकड़ा, जो दिल्ली सरकार द्वारा परीक्षा परिणाम आने के बाद हुए Result Analysis के जरिये साझा किया गया 


इसलिए ये कहना कि ये ऐतिहासिक घटना है, गलत है! 

2) ये भी कहना अतिरेक है कि परीक्षा परिणाम में सुधार केवल आप की सरकार बनने के बाद हुए. आंकड़े बताते है कि दिल्ली के सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के परीक्षा परिणामों के गैप पहले के मुकाबले बेहद कम हुए है.

देखिये आंकड़े (स्लाइड न.12)

देख सकते है कि कभी 13% से पिछड़ने वाले दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों की न केवल बराबरी की, बल्कि उसे पछाड़ा भी. बीते 3 साल से यही दुहराया जा रहा है लेकिन सरकारी और प्राइवेट के बीच का फासला बहुत अधिक का नही है जैसा बीते दशकों में था.

3) रही बात दिल्ली के बच्चों के प्रदर्शन की तो ये हमेशा से ही बेहतर रहा है. ऊपर के आंकड़े बताते है कि 2008-2015 तक दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का परीक्षा परिणाम कभी 85% से कम नही हुआ. पिछले 3 सालों में अगर मामूली बढ़त हुई भी है तो उसी अनुपात में प्राइवेट स्कूलों का भी परिणाम सुधरा है. इस वर्ष यानी 2018-19 में अगर सरकारी स्कूलों का आंकड़ा 94% था तो प्राइवेट स्कूलों के आंकड़े भी 90% से ऊपर थे.


4) यहाँ यह भी देखना पड़ेगा कि जहाँ सरकारी स्कूलों में बच्चें कम हो रहे है, वही प्राइवेट स्कूलों में बच्चें बढ़ रहे है हर साल.

दिल्ली के इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट देखिये

5) सरकारी स्कूलों में नामांकन घट रहे है, वही प्राइवेट स्कूलों में कुल नामांकन का शेयर भी दिल्ली में बढ़ता जा रहा है. सरकार द्वारा जारी की गयी इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट के आंकड़े इसकी गवाही देते है. इसके मुताबिक 2014-15 में जहाँ प्राइवेट स्कूलों का शेयर 31 % था, 2017-18 में वह बढ़कर 45.5% से भी अधिक हो गया. 


6) यहाँ पर एक बेहद चौंकाने वाली बात है कि परीक्षा परिणाम भले ही चाहे जैसा आये, परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या हमेशा बढ़ती रही है, लेकिन जैसे ही आप सरकार में आई, परीक्षा में बैठने वाले विद्यार्थियों की संख्या घट गई.

देखिये बीते एक दशक से भी अधिक के आंकड़े. 





जाहिर सी बात है, जब से आप आई है, दिल्ली के सरकारी स्कूलों से 12वीं की परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या कम होती जा रही है. 

7) जो सबसे प्रमुख बात है कि हर साल 9वीं एवं 11वीं की परीक्षा में बड़ी संख्या में बच्चों को फेल किया जा रहा है ताकि केवल अच्छे बच्चें ही 12वीं की परीक्षा दे सकें. हर साल परीक्षार्थियों की घटती संख्या इसकी गवाही देते है. जहाँ हर साल लगभग 50% बच्चों को 9 वीं में फेल कर दिया जाता है (देखे आंकड़े)



वही 11वीं कक्षा में भी 28-29% बच्चों को फेल कर दिया जाता है. पढ़े इंडियन एक्सप्रेस की ये ख़बर.


इसके बावजूद परिणामों में आंशिक बढ़ोतरी को इस तरीके से बताया जाता है मानो करामात हो गया.


द प्रिंट रिपोर्ट पढ़िए कि कैसे फेक तरीके से प्राइवेट स्कूलों को दिल्ली के सरकारी स्कूल पछाड़ रहे है-

Delhi govt schools beat private schools in class 12 results. Reason: 50% flunk class 9
https://theprint.in/india/governance/delhi-govt-schools-beat-private-schools-in-class-12-results-reason/65484/


10वीं का परिणाम आते ही केजरीवाल सरकार के शिक्षा-क्रांति के दावे हवा हो जाते है


जिस 12वीं के परिणाम पर आप और उसके समर्थक सरकार की प्रशंसा करते नही अघाते, उन्हें 10वीं का रिजल्ट आते ही सांप सूंघ जाता है.

जानते है कुछ तथ्य, 

1) इस वर्ष यानी 2018-19 में प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले दिल्ली के सरकारी स्कूल 21% पीछे रहे है. जहाँ दिल्ली के सरकारी स्कूलों का सामूहिक प्रतिशत 71.58% था, प्राइवेट स्कूलों का परिणाम 93.12% था. (पढ़े)


2) पिछले सत्र यानी 2017-18 में 10वीं के परीक्षा परिणाम आये तो जहाँ सरकारी स्कूलों के 69.32% बच्चें पास हुए थे, प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के पास करने का प्रतिशत 89.45% था. यानी प्राइवेट और सरकारी स्कूलों के बीच फासला 20% का था. (पढ़े)


दिल्ली बीते दो सालों में 10वीं की परीक्षा में राष्ट्रीय औसत से भी बेहद घटिया परिणाम दे रहा है इसके बावजूद इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई आगे नही आ रहा.

3) दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 10वीं के रिजल्ट की हालत एक दशक पहले भी ऐसी नही थी.यह आप सरकार को श्रेय जाता है कि दिल्ली का प्रदर्शन पिछले एक दशक का भी रिकॉर्ड तोड़ अपने सबसे निम्नतम स्तर पर आ गया है.



4) प्राइवेट और सरकारी के बीच के गैप को पाटने में जो मेहनत दिल्ली के सरकारी स्कूलों में आप की सरकार बनने से पहले हुई थी, उसे चौपट करने की जिम्मेवारी दिल्ली सरकार को ही लेनी चाहिए. सरकारी और प्राइवेट के बीच के नेगेटिव फासले को यानी -45% से जो सरकारे प्लस में ले आई थी, 2013 में प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ने का काम किया हो, आप की सरकार उसे दुबारा -21 में ले आई. 

5) यह हालत तब है जबकी पिछले साल लगभग 42% बच्चें 9वीं की परीक्षा में फेल हो गए थे. यानी बेहतर बच्चें ही अगली कक्षा में भेजे गए. 


जैसा कि ऊपर भी बताया गया, जिस 10वीं की परीक्षा में दिल्ली के सरकारी स्कूलों के परीक्षा परिणाम बीते दो सालों से बेहद ख़राब आ रहे है, उसी 10वीं की परीक्षा में 2013 में दिल्ली के बच्चों का प्रदर्शन प्राइवेट स्कूलों से बेहतर था. (पढ़े

5) दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बड़ी संख्या में उन बच्चों को दुबारा नामांकन नही लेने दिया जा रहा, जो फेल हो गए थे. पिछले सत्र (2017-18) में ऐसे बच्चों की संख्या 66% थी.

पढ़े दिल्ली हाई कोर्ट में अधिवक्ता अशोक अग्रवाल की याचिका का ये हिस्सा 




दिल्ली सरकार को 12वीं के Manipulated Achievement पर वाहवाही बटोरने की वजाए कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नों का जबाब देना चाहिए कि -

1) लर्निंग आउटकम बढ़ाने के बड़े बड़े दावों के साथ "मिशन चुनौती" और "मिशन बुनियाद" चलाने के बावजूद भी इस तरह के परिणाम क्यों आ रहे है? 

2) परीक्षा परिणामों को सुधारने के लिए बच्चों को क्यों फेल किया जा रहा है?

3) जो बच्चें फेल हो रहे है, उन्हें दुबारा नामांकन क्यों नही लेने दिया जा रहा?

4) सरकार चुनिन्दा स्कूलों की रंगाई-पुताई और कुछ भवन बनाकर वाहवाही लुटने की वजाए पढ़ने-पढ़ाने के ऊपर क्यों नही ध्यान दे रही?

  दिल्ली सरकार के मुखिया को ध्यान रखना चाहिए कि कागज़ी आंकड़ों की बाजीगरी करके भले आप वाहवाही लुट ले, करोड़ों लुटाकर मीडिया का ध्यान भटका दें, जिन गरीब के बच्चों को स्कूली व्यवस्था से दूर कर रहे है, उन बच्चों के साथ खिलवाड़ कर राष्ट्र-अपराध कर रहे है.

May 5, 2019

Fake revolutionary model of Delhi Education


In the last few years, the Delhi Government lead by Mr. Arvind Kejriwal has remained in news for the supposed ‘revolution’ it brought about in the education system, particularly in the Government schools in the State. Last year, the government allocated 26% of its budget for the education sector which far more than the education budget in other states of India.

The reality, however, is that the Delhi Government can afford to allocate such a big chunk of its budget for education is because by virtue of being the national capital, the government has more funds and limited areas for expenditure. The per capita income in Delhi is ₹3,65,529 which is thrice the national average of ₹1,25,397. Also, revenue surplus of Delhi was ₹4,913 crores, in contrast to most other states which are under huge amounts of debt because their expenditure is far more than their income. Moreover, Aam Aadmi Party’s claim that it is for the very first time that a Government has allocated such an amount for education is false. In the past, states like Bihar and Meghalaya, amongst others, have also allocated 25% - 30% of their budget for education. Since 2000, Delhi Government has always allocated more than 15% of its budget for education. In 2012-13, the per student expenditure was ₹29,641, which has increased to ₹61,622 in 2017-18. Despite this, its share in GSDP is still less than 2%. This means that even though the budget allocation for education has increased, its share in the GSDP has remained the same.



Even though the allocation is high, the actual expenditure is very low. In 2014-15, 62% of the allocated budget was spent, in 2015-16, 57% and in 2016-17, this figure was 79%. The AAP Government claims to allocate 25-26% of its budget for education but this figure is always reduced in the revised budget.




See the status of Budget allocated in the last financial year 2018-19





The truth behind the ‘revolution’ in the education sector of Delhi


In their election manifesto for the 2019 Lok Sabha Elections, the AAP claimed that the Delhi Government has brought about some revolutionary changes in the schooling system of Delhi. However, the reality is that the number of enrollments are decreasing in government schools and there is no visible impact of the same on annual results.



Enrollments –


The number of enrollments are decreasing with every passing year. In between 2013-14 and 2017-18, 1,32,138 students have decreased in total number of enrollment in each session, which is nearly 8%. 





In the 2014-15 batch of 7th standard, 97% of the enrolled students were promoted to the 8th standard in 2015-16. However, when these students were promoted to 10th standard in 2017-18, their percentage had dropped down to 55%. The inference that can be drawn here is that in 9th standard, nearly half of the enrolled students failed and in 11th standard, nearly 33% of them failed. Resultantly, the government projected a good result and took credit for this so called ‘revolution’ without revealing the above stated facts. 




Here, the most important factor is that the population of Delhi is increasing and enrollment in government schools is decreasing instead of increasing.



Here, two things that deserve consideration are:

1.      Delhi Government is trying to deprive students of education in government schools in large numbers, and

2.      The students who fail are not being allowed to enroll themselves again in government schools.

Only in 2018-19, of students who failed between 9th and 12th standard,  66% were not allowed to enroll again. In 9th, 52%; in 11th, 58% and in 12th, 91% of students who failed were denied re-admissions. See information collected by Adv Ashok Aggrawal



Learning Outcome –

The level of education in Delhi, is far less than the national average.



Also, the government took a challenge and students who failed 9th standard were allowed to pursue 10th standard through correspondence. An abysmally low percentage of 2% only could pass from this group of students in 2016-17.  Only 2% of students who dropped out from government schools in 2017-18 took re-admission.  On the basis of data available for the last five years, the passing percentage for students who took a correspondence course is only 4%. (Ref: Praja Foundation report)



The passing percentage for 10th standard in 2017-18 has dropped down to 68.90% from 92.44% in 2016-17. The AAP argued that the reason for this drop was problem in implementing the CBSE syllabus but the fact of the matter is that has been dropping constantly. This is why a large number of students are being deliberately failed in 9th and 11th so as to project a positive result on 10th and 12th standards. Moreover, the students to fail 10th and 12th standards are denied re – admissions.



Last year, the government denied responsibility for a poor result in 10th standard but took full credit for a miniscule improvement in the the result for 12th grade. The entire strategy was exposed by The Print in a report

We can also see a very disturbing trend in a number of appeared students for the 12th Exam each year since AAP came in power-



Even this year, only 1,22,428 students were appeared in 12th exam, while 171613 students were enrolled in class 11th in 2017-18. No one knows where's rest 29% students. 

Science taught only in 28% of schools –

As per a reply received to an RTI, only 28% of government schools in Delhi teach Science. At a time when the need of advancement in science and technology is being felt across the world, schools in Delhi are not even teaching the basic fundamentals of the field.



Unavailability of teachers –

As per report of Times of India, there were vacancies for 33,783 teachers corresponding to nine subjects of which only 19,243 permanent appointments were made, 8,713 appointments were made as temporary guest teachers and 17% of the vacancies are still vacant.  In a press conference held on 6th March, 2019, Education Minister of Delhi, Mr. Manish Sisodia informed that in Delhi, out of 64,000 available vacancies for teachers, 58,000 appointments were made out of which 22,000 were as guest teachers. Even Delhi cabinet has also approved a policy to allow them to work till the age of 60- like regular teachers.

The interesting thing to note here is that 77% of these guest teachers were unable to get minimum pass marks in the examination against vacancies in Delhi Govt Schools.



According to the information sought under the Right to Information (RTI) Act, there are 918 posts of principals in 1,024 Delhi government schools. Some 106 schools don''t have such posts. Out of 918 posts of principals, 595 are lying vacant, the reply revealed.

It said 768 vice principals are holding the charge of the head of the school "due to principals not physically working or some schools have(ing) no post of principal".

Infrastructure –

At the time of assembly elections, AAP promised to open 500 new schools but even after 4.5 years, there is no sign of even 5% of this number even though the government has 82 vacant plots.

As per the reply to an RTI, only 23 new schools have been opened up in Delhi. In contrast, in one year itself, in 2013-14, 12 schools were opened up in Delhi. Out of the 23 new schools which the AAP claims to have opened up, according to a statement issued by former education minister Arvinder Singh Lovely, 10 were opened up at the time of the previous government lead by the INC.



In the manifesto for 2019 Lok Sabha elections, AAP has claimed that in order to improve education system, infrastructure is needed but for any effective development in that area, Delhi needs complete statehood. But, full statehood is just an excuse. In 2015, AAP claimed that there are 24,157 classrooms in Delhi schools and the Delhi government made 8,213 new classrooms despite all hurdles. Now, when the Delhi Government is able to improve infrastructure as claimed by them, why are they giving and excuse of full statehood to Delhi?

The Delhi government has spent 250 crores only on 52 selected model schools, ignoring the remaining majority. The system in these model schools is also ripe with corruption. The government is claiming credit by projecting the good optics of only a handful of schools picked after ignoring thousands others.

Below are the estimates of the Economic Survey pertaining to infrastructural development in schools of Delhi -



May 4, 2019

शिक्षा: आम आदमी पार्टी का घोषणापत्र या झूठ का पुलिंदा


लोकसभा चुनाव -2019 को ध्यान में रखते हुए आम आदमी पार्टी ने पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग के साथ अपना घोषणापत्र बीते दिनों जारी किया है. पिछले बार की वजाए इसबार आप बेहद कम सीटों पर चुनाव लड़ रही है. दिल्ली में गठबंधन की तमाम कोशिशों के बावजूद और कई बड़ी रैलियों में आप मुखिया के भाग लेने के बाद भी किसी भी विपक्षी दल से इसका सीधा गठजोड़ नही हो सका है और आप अकेले मैदान में है. लेकिन पार्टी को पूरा भरोसा है कि अपने "काम न करने देने" के बहाने गिनाकर वह दिल्लीवासियों के वोट हासिल कर लेगी. 

आप ने जो घोषणापत्र जारी किया है, उसको दो खंडो में विभाजित किया है- पहला, जो काम उसने "मोदी सरकार" के तमाम रुकावटों के बावजूद किया है, वही दूसरा, जो पार्टी दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद करेगी.

आईये समझते है आप के घोषणापत्र को. बात केवल शिक्षा की.    

आप ने घोषणापत्र में पहली उपलब्धि बताया है कि - 

2015 में दिल्ली सरकार के स्कूलों में कुल 24,157 कक्षाएं थी. केंद्र सरकार की तमाम रुकावटों के बावजूद दिल्ली सरकार ने 8213 नए क्लासरूम बनाए हैं. नवंबर 2019 तक 12748 और नए क्लासरूम बनकर तैयार हो जायेंगे.

असलियत- 7 मार्च 2017 को विधानसभा में दिए अपने भाषण में मनीष सिसोदिया ने कहा कि 24 नए स्कूल शुरू हो रहे है, 8000 नए कमरों का काम लगभग पूरा हो गया. पढ़े बजट भाषण -


लेकिन आप की आधिकारिक वेबसाइट कुछ और हकीक़त बता रही है. 7 अक्टूबर 2017 को जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक केवल 5695 ही कमरे बने. पढ़े प्रेस रिलीज .

2017 से ही सरकार यही माला जप रही है कि हमने 8000 कमरे बनवा दिए. सच्चाई कुछ और ही बता रही है. 

भला हो इकॉनोमिक सर्वे का, जिसने ये बताया कि बने तो 8000 लेकिन लगे पुरे 4.5 साल. जो सरकार 24-25% बजट आवंटित करवाने के बावजूद 4.5 सालों में 8000 कमरा बनवाती है, वह सरकार केवल 6 महीने में 12000 बनवाने का दावा करे तो हँसी आनी स्वाभाविक है. 

लेकिन ये उपलब्धि बताकर आप सरकार ने पूर्ण राज्य के अपने मांग के तर्क से ठीक उलट बातें कर दी. आप ने अपनी घोषणापत्र में यह कहा कि सभी बच्चों को शिक्षा का समान अवसर प्रदान करने के लिए जिस प्रकार के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरुरत है, उसे पूर्ण राज्य के दर्जे के बगैर पूरा कर पाना संभव नही है. दिल्ली सरकार के पास ज़मीन और शिक्षकों की स्थायी नियुक्ति करने का अधिकार न होना इसमें सबसे बड़ी रुकावट है. 

यहाँ आंकड़े साफ़ कहते है कि इंफ्रास्ट्रक्चर  के विकास के लिए दिल्ली सरकार चाहे तो काम कर सकती है. इसके लिए उसके पास पैसा भी है, बजट भी है और  विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता की माने तो बहुत जगहों पर ज़मीने भी. 

आप की सरकार ने पहले दिन से सभी स्कूलों के हितों की चिंता की वजाए दिल्ली के केवल 52 स्कूल मॉडल स्कूल के नाम पर चुने और उन्हें बेहतर स्कूल बनाने के लिए करोड़ों खर्च किये है. अच्छी बात है लेकिन आप की सरकार ने यहाँ भी काम नही किया. पढ़िए इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट 

केजरीवाल और उनके समर्थक अमूमन जिन चमकती-धमकती तस्वीरों को वर्ल्ड क्लास स्कूल बनाने के दावे के साथ साझा करते है, दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित वह स्कूल सर्वोदय बाल विद्यालय भी इन्हीं में से एक है. इसी एक स्कूल में आप सरकार ने 10 करोड़ खर्च किये है, जिसमें जिम भी बना है. कहा जाता है कि दिल्ली के केवल इसी स्कूल में सरकार ने जिम बनवाये, वही दिल्ली के 2 स्कूलोंमयूर विहार फेज-2 और ईस्ट विनोद नगर के स्कूलों में लगभग 5 करोड़ की लागत से स्विमिंग पूल बनवाये, लेकिन चित्र देशभर में ऐसे साझा किये गए, मानो सभी स्कूलों में स्विमिंग पूल है, जहाँ बच्चें तैराकी सीख रहे है, पानी से खेल रहे है, और जिम जाकर अपना शरीर हष्ट-पुष्ट बनाने में जुटे है.   

जाहिर सी बात है कि जो सरकार जिम, स्विमिंग पूल और वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए करोड़ों खर्च करने का अधिकार रखती है, उसका पूर्ण राज्य की दर्जा की बेतुकी मांग के आड़ में बाकी के सैंकड़ों स्कूलों को बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखना समझ से परे है. आज भी दिल्ली के अधिकांश स्कूलों में बच्चों के बैठने की जगह पर्याप्त नही है अथवा अधिक बच्चें एक ही कक्षा में बैठकर पढ़ते है.


आप ने अपनी दूसरी उपलब्धि बताते हुए कहा है कि सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को प्रशिक्षण देने के लिए फ़िनलैंड, सिंगापूर, ब्रिटेन जैसे देशों में भेजा गया ताकि दिल्ली के बच्चे भी विश्वस्तरीय शिक्षा प्राप्त कर सकें.

दिल्ली में लगभग 36000 स्थाई शिक्षक नियुक्त है. Dialogue & Development Commission of Delhi द्वारा 4 साल की उपलब्धि पर फरवरी 2019 में जारी रिपोर्ट की माने तो बीते 4.5 साल में 695 शिक्षकों को विदेश यात्रा पर भेजा गया है.  


दिल्ली के केवल 291 स्कूलों में विज्ञान पढ़ाई होती है. विज्ञान एवं गणित की पढ़ाई जहाँ होती भी है, वहां पर्याप्त शिक्षक नही है. गणित के लिए सृजित 5758 पदों में से 2408 और विज्ञान के 5570 पदों में से 2165 पदों पर आज भी कोई स्थाई शिक्षक नियुक्त नही है. सवाल उठता है कि जिस सरकार की प्राथमिकता में विज्ञान है ही नही, क्या वह विज्ञान के शिक्षकों की वजाए सोशल साइंस के शिक्षकों को 'इतिहास कैसे पढ़ाया जाए', इसका प्रशिक्षण लेने के लिए शिक्षकों को विदेश यात्राएँ करवा रही है! विदेश में तो STEM केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था को जाने-समझने लोग जाते है. दिल्ली क्या सीखने के लिए शिक्षकों को भेज रही है, समझ से परे है! यहाँ पर एक बात समझने वाली है, जिसपर सही से जाँच-पड़ताल होना जरुरी है कि शिक्षकों को चुनने के मापदंड क्या है? चयनित शिक्षकों में से व्यक्तिगत तौर पर कुछ को जानता हूँ, वे सरकार के चीयरलीडर्स की तरह दिनरात गुणगान में व्यस्त रहते है. कही ये राजनैतिक फायदा उठाने और सरकार समर्थक शिक्षकों की सेवा का माध्यम तो नही बन रहा?


दूसरी बात, दिल्ली के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के सामाजिक और आर्थिक पृष्ठभूमि को देखते हुए क्या सरकार को उन कमजोर बच्चों पर ध्यान देने के लिए प्रशिक्षण नही दिलवाने चाहिए थे, जिन्हें वह हर साल बड़ी संख्या स्कूलों से फेल करके बाहर निकाल देती है? केवल इसलिए कि वे कमजोर है, शिक्षक उपलब्ध नही है और स्थिति इतनी सुदृढ़ नही कि कोई बाहरी ट्यूशन/कोचिंग भी ले सकें! विश्व स्तरीय शिक्षा की नक़ल करने से पहले दिल्ली-स्तरीय शिक्षा व्यवस्था बनाने में जो सरकार विफल रही हो, वहां ऐसे प्रयास भले ही प्रथम दृष्टया अनुचित नही लगते हो, लेकिन भटकी हुई प्राथमिकता की जरुर गवाही देते है. 



आप ने अपनी घोषणापत्र में कहा कि विशेष पहल के द्वारा बच्चों की सीखने की बुनियादी क्षमताओं को सुदृढ़ करने का सफल प्रयास किया गया. इसके अतिरिक्त हैप्पीनेस पाठ्यक्रम, एंटरपेन्योरशिप पाठ्यक्रम और संवैधानिक मूल्यों पर कैम्पेन के द्वारा बच्चों का सर्वांगीन विकास किया जा रहा है.

दिल्ली सरकार के द्वारा  बच्चों के सीखने की बुनियादी क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए दो मशहूर कार्यक्रम चलाये गए. पहला मिशन चुनौती, दूसरा मिशन बुनियाद।

इन दोनों कार्यक्रमों में से एक मिशन चुनौती का सरकार ने लक्ष्य तय किया था कि 6-8 वीं कक्षा के बीच जो लर्निंग गैप है, उसे खत्म करेंगे तथा 9 वीं कक्षा में ड्राप आउट दर को शून्य करेंगे. 

पढ़िए क्या था लक्ष्य मिशन चुनौती कार्यक्रम का (संदर्भ - आप द्वारा जारी किया गया शिक्षा पर रिपोर्ट -Transforming Delhi Education)




लेकिन ये कार्यक्रम अपने मकसद में सफल नही हो सका. लर्निंग गैप पाटने के तमाम दावे खोखले साबित हुए. परिणामों में मामूली सुधार देखने को मिले, स्थिति वैसी की वैसी ही बनी रही. 

उसी रिपोर्ट का एक और अंश -


इस कार्यक्रम के तहत वर्ष 2016-17 में नौवीं के 59897 कमजोर बच्चों को विश्वास समूह में रखकर दिल्ली के स्कूलों से उठाकर सीधे पत्राचार कार्यक्रम में कक्षा-10 में धकेल दिया गया. इनमें से केवल 2% ही पास हो सकें।  

जिन बच्चों को पत्राचार कार्यक्रम में भेजा गया, वहां पर शिक्षक भी पर्याप्त संख्या में नही थे. देखे प्रजा फाउंडेशन द्वारा जारी किये रिपोर्ट का महत्वपूर्ण हिस्सा-



पत्राचार कार्यक्रम की विफलता से परेशान विद्यार्थियों ने 2016-17 सत्र के बाद अगले सत्र में नामांकन भी लेना लगभग बंद कर दिया.

मिशन बुनियाद कार्यक्रम की भी हालत कुछ खास अच्छी नही रही. अप्रैल 2018 में शुरू हुए इस कार्यक्रम का रिपोर्ट बताता है कि यह कार्यक्रम कक्षा- 3 से लेकर 9वीं तक के बच्चों में टेक्स्टबुक पढ़ने और सामान्य गणितीय समझ बढ़ाने पर केन्द्रित था. इस कार्यक्रम की शुरुआत करने के उद्देश्य थे कि दिल्ली के स्कूलों में पढ़ने वाले उन 52% बच्चों की कौशल क्षमता बढ़ाना, जो गणित व हिंदी से संबंधित दक्षताओं में अपनी कक्षा के अनुरूप नही थे. यानी भारी-भरकम बजट खर्च करने वाले दिल्ली में आधे बच्चों को बुनियादी क्षमताएं आती ही नही थी. कार्यक्रम से दिल्ली सरकार ने काफी सुधार होने का दावा किया. 

देखिये Dialogue & Development Commission of Delhi की रिपोर्ट का अंश 


मिशन बुनियाद और मिशन चुनौती के सफल होने के तमाम दावे झूठे साबित हुए क्योंकि न तो सही से क्रियान्वयन की कोई योजना थी, न 9वीं में पास होने वाले बच्चों के पास परसेंटेज में कोई ख़ास बदलाव आया, न ही मिशन चुनौती के तहत किये प्रयासों का कोई परिणाम नेशनल अचिवेमेंट सर्वे (NAS)-2017 की रिपोर्ट में देखने को मिला. NAS की रिपोर्ट में दिल्ली का प्रदर्शन कक्षा- 3-8 की श्रेणी में राष्ट्रीय औसत से भी कम था. 



कक्षा 7वीं और 8वीं के जिन बच्चों की दक्षता बढ़ने के दावे किये गए, उनके कक्षा 9 में जाने के बाद भी परीक्षा परिणामों पर कोई विशेष फर्क नही पड़ा और बड़ी संख्या में बच्चें फेल होते रहे. जहाँ वर्ष 2017-18 में 57.4% बच्चें 9 वीं कक्षा की परीक्षा में उतीर्ण हुए, वही 2018-19 की परीक्षा में पिछले सत्र के मुकाबले मामूली बढ़ोतरी हुई और 0.4% की वृद्धि के साथ 57.8 रहा। (संदर्भ देखे) यानी वर्तमान सत्र में भी  लगभग 52% बच्चे आप की सरकार के तमाम दावों और वादें के बावजूद ड्रापआउट कर दिए गए.(और पढ़े- इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट)

सबसे ख़तरनाक जो ट्रेंड दिल्ली के स्कूलों में चल रहा है, वह है कक्षा-12 की वार्षिक परीक्षा में में प्रतिवर्ष बैठने वाले बच्चों की घटती संख्या। इन बच्चों में पिछले वर्ष फेल हुए कुछ बच्चें भी शामिल रहते है, जो यह साबित करता है कि बेहद कम बच्चें कक्षा-12 वीं तक पहुँच पा रहे है. वर्ष 2018 में आये परिणाम के बाद दिल्ली सरकार द्वारा 12वीं के परिणाम की समीक्षा के लिए जो पीपीटी तैयार की गई थी, उसका अंश देखे, जिसमें प्रतिवर्ष परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या में आप सरकार आने के बाद लगातार संख्या घटती जा रही है-
कहना गलत नही होगा, सीखने के स्तर सुधार के तमाम वादे दिल्ली के जनता के आँखों में धुल झोंकने वाला है.


हैप्पीनेस क्लास/एंटरपेंयोरशिप पाठ्यक्रम 


पहले बात करते है बहुचर्चित हैप्पीनेस क्लास की, जिसे पिछले वर्ष शुरू किया गया है. इसमें शिक्षकों को प्रतिदिन किये जाने वाले गतिविधियों को करने संबंधी जो दिशा निर्देश गए है, उसका अंश गौर से देखिये (टीचर हैंडबुक, पृष्ठ संख्या-9, कक्षा-3-5/6-8)

   

अब जरा मध्य प्रदेश के स्कूलों में लागू होने वाले टाइम टेबल को गौर से देखिये (संदर्भ- राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा 13 जून 2018 को जारी पत्र क्रमांक- 2195) -



देखने से एक बात स्पष्ट हो जायेगी कि दिल्ली के स्कूलों में कुछ अनोखा नही हो रहा. बल्कि देश के लगभग सभी राज्यों में टाइम टेबल का एक हिस्सा उन गतिविधियों पर जरुर केन्द्रित रहता है, जो बच्चों के शारीरिक व मानसिक विकास के साथ साथ जीवन शैली, व्यवहार और आम-जिन्दगी की बातों से उन्हें परिचय करवाए, उन्हें उनके मनमर्जी की चीजे करने की छुट दे, जिनसे बच्चों को ख़ुशी मिलती है. 

अलग बस इस मायने में है कि दिल्ली सरकार ने भारी-भरकम बजट खर्च करके, सरकार की सहयोगी अनेक संस्थाओं को उपकृत करके कहानियों का संग्रह तैयार करवाई, कुछ अन्य गतिविधियाँ जोड़ी, कक्षा में उसे करने के तरीके बताये और उसे हर विद्यालय में मुख्यमंत्री/शिक्षामंत्री के फोटो और संक्षिप्त भाषण के साथ सभी स्कूलों तक पहुंचवा दिया। कहना बिल्कुल गलत नही होगा कि हैप्पीनेस पाठ्यक्रम दशकों से स्कूलों में होनेवाली गतिविधियों की रि-पैकेजिंग हैजिसमें कहानियों का संग्रह और दैनिक जीवन के व्यावहारिक गुणों के बारे में विशेष जोर है. फर्क बस इतना है कि इसे बुकलेट का शक्ल देकर दलाई लामा जी के हाथों से लांच करवाकर पूरी दुनिया में PR एक्टिविटी का एक मौका सरकार को मिला.

बच्चा कितना ख़ुश है अथवा नही, इसका अंदाजा बाद में लगेगा, लेकिन फिलहाल जो भी ख़ुशी बच्चों को मिल रही है 8वीं तक, उनपर 9वीं आते आते ग्रहण लगना तय है. क्योंकि सरकार पढ़ाने पर ध्यान देने की वजाए अच्छा प्रदर्शन न करने की क्षमता आंकते हुए उन्हें फेल करेगी ताकि 10 वीं और फिर बाद में 12वीं की परीक्षा परिणाम सुधारा जाए और दुनिया को अच्छी तस्वीरें दिखाई जाए. शायद लाखों बच्चों की रोने और रोते-विलखते बच्चों की तस्वीर दिल्ली के किसी और स्कूल के किसी हँसते हुए बच्चों के आगे दब जायेगी.


एंटरपेंयोरशिप पाठ्यक्रम अभी ज़मीन पर उतरा भी नही है लेकिन आप ने इसे अपनी उपलब्धियों में शामिल कर लिया. यह कार्यक्रम जुलाई 2019 से लागू होगी. लेकिन इसका लौन्चिंग भव्य तरीके से त्यागराज स्टेडियम में किया गया, जहाँ चुनाव से पहले यह दिखाया गया कि हम कुछ बड़ा कर रहे है. 

13 फरवरी 2019 को एक बड़े समारोह में  एंटरपेंयोरशिप पाठ्यक्रम को लागू करने के लिए जो Entrepreneurship Mindset Curriculum दिल्ली सरकार द्वारा जारी किया गया, उसमें काम की बातें कम, नेताओं/अधिकारीयों के भाषण अधिक है. 40 पृष्ठों के इस बुकलेट में 16 पृष्ठ इन्ही सबके लिए है. वही मुख्य विषयवस्तु अंग्रेजी में 11 पन्ने तथा इसका हिंदी अनुवाद 10 पन्ने में लिखा गया है. ऐसा लगता है मानो आनन-फानन में लोगों के बीच लाना मकसद हो. उद्देश्य इसका भले सही हो, आप की पब्लिसिटी करने के लिए PR रणनीति का हिस्सा ज्यादा बच्चों के लिए कम लगता है.




आप ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि स्कूल मैनेजमेंट कमेटी(SMC) के तहत पहली बार बच्चों के माता-पिता को स्कुल संचालन में शामिल किया गया. दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हर तीन महीने पर मेगा पैरेंट्स टीचर मीटिंग हो रही है. 

SMC देश के हर सरकारी स्कूलों में है, जिसके कुछ सदस्य अनिवार्य रूप से अभिभावक ही होते है. (देखे MHRD के वेबसाइट का ये लिंक) दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार थी, उसी समय शिक्षा के अधिकार कानून के अनुपालन में 25 मार्च 2013 को एक पत्र जारी किया गया, जिसमें स्पष्ट लिखा है कि 16 सदस्यीय SMC में 12 सदस्य बच्चों के माता-पिता/अभिभावक होंगे. 


इसी पत्र में यह कहा गया था कि कम से कम दो महीने में एकबार SMC की बैठक अवश्य होनी चाहिए. इसमें नया क्या है, समझ से परे है. हाँ, सरकार के साथ कुछ NGO जरुर SMC पर काम कर रहे है, वही सरकार ने थोड़े बजट भी बढ़ाए है. 

आप ने अपने घोषणापत्र में एक और उपलब्धि बताते हुए कहा है कि पहली बार पिछले 3 सालों से लगातार 12वीं के रिजल्ट प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले बेहतर रहे है.


जैसा कि ऊपर भी चर्चा हो चुकी है, 12वीं का परिणाम इसलिए बेहतर नही आ रहे कि स्कूलों में बेहतर पढ़ाई हो रही है, बल्कि इसलिए आ रहे है क्योंकि बड़ी संख्या में बच्चों को या तो 9वीं में फेल कर दिया जा रहा है, जो बच्चें 10वीं में फेल हुए उनकों दुबारा एडमिशन नही दिया जा रहा, 11वीं में जो बच्चें आ गए और कही से पिछड़ रहे हो तो उन्हें 12वीं में नही जाने दिया जा रहा, वही जो 12 वीं में पिछले सत्र में फेल है उनमें से अधिकांश को दुबारा परीक्षा नही देने दिया जा रहा. 

आप की सरकार बनने के बाद हर वर्ष 12वीं कक्षा की परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या में भारी कमी देखि गई है. प्राइवेट को पछाड़ने की कहानी भी बिल्कुल बेबुनियाद है और इसकी द प्रिंट ने अपनी विशेष स्टोरी में बखिया भी उधेड़ रखी है.

अगर इसी वर्ष जारी परिणाम को आंकड़े से समझने की कोशिश करें तो लगभग 29% बच्चों को पिछले साल 11वीं में फेल कर दिया गया था. जो बच्चें इस साल 12वीं की परीक्षा दे रहे थे, वे जब सत्र 2015-16 में 9वीं कक्षा में थे तो उनके साथ कुल विद्यार्थी साथी 288094 थे, लेकिन इनमें से केवल 164065 विद्यार्थी ही सत्र 2016-17 में पहुंचे और कक्षा-10 वीं की परीक्षा में बैठ सकें. वही सत्र 2017-18 में कुल 171613 बच्चें 11वीं में थे, केवल 122428 बच्चें ही 12वीं की परीक्षा में बैठे. पिछले सत्र में फेल हुए और दुबारा बैठे बच्चों की संख्या को नजरअंदाज भी कर दे तो कुल अंतर 165666 बच्चों का है. इनकी किसे सुध है! इतनी बड़ी संख्या में बच्चों को फॉर्मल स्कूली शिक्षा से दूर करना और कोई हो-हल्ला भी न होना, समझ में आता है कि आप सरकार हर कॉलेज के गवर्निंग बॉडी में अपने बीट रिपोर्टरों/संपादकों को क्यों बिठा रही है.


आप की घोषणापत्र में एक और उपलब्धि बताई गयी है कि 12 वीं के बाद उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली के बच्चों को 10 लाख रुपये तक गारंटी फ्री लोन की व्यवस्था की गई.

दिल्ली जैसे अमीर राज्य के लिए गारंटी फ्री लोन दिलाना मामूली काम है. मध्य प्रदेश जैसा राज्य तो अपने बच्चों को पूरी फीस माफ़ कर देता है. मुख्यमंत्री मेघावी विद्यार्थी योजना के आगे दिल्ली की ये पहल कुछ भी नही, जिसमें न तो लोन की दरों में कोई कमी हो रही, न ही सरकार मदद दे रही.


पूर्ण राज्य मिलने के बाद

आम आदमी पार्टी ने खुद को असहाय और केंद्र सरकार का पीड़ित बताते हुए पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग कर रही है और दर्जे मिल जाने से ही दिल्ली के हर समस्या के समाधान करने की बात जोरो-शोरो से कर रही है. 

आप ने शिक्षा को लेकर भी अपनी कुछ ऐसी ही वादे शामिल किये है, जो वह पूर्ण राज्य के मिलने पर ही पूरी कर सकेगी. जानते-समझते है कि क्या है वे वादे-


आप के वादे 


1) शिक्षा के अधिकार का विस्तार- राज्य सरकार नया कानून लाएगी, जिसके तहत दिल्ली के हर बच्चे को नर्सरी से लेकर 12वीं तक अनिवार्य और विश्वस्तरीय शिक्षा मुफ्त में पाने का अधिकार मिलेगा, जिससे हर बच्चा खुशहाल, आत्मनिर्भर व सजग नागरिक बने सकें.

- शिक्षा के अधिकार का विस्तार करना राज्य के वश के बाहर की बात है. 

2) कॉलेज एजुकेशन का अधिकार- 12वीं में 60 फीसदी से अधिक नंबर पाने वाले दिल्ली के सभी छात्रों को कॉलेज में बतौर रेगुलर स्टूडेंट एडमिशन मिलेगा.

- ये ऐसा ही वादा है, जैसे किसी को चाँद पर घर गिफ्ट करने का वादा करना. दिल्ली सरकार के अधीन कॉलेजों में न तो इतनी सीटें है, न ही सरकार ने विधानसभा चुनाव के समय 20 नए कॉलेज खोलने के अपने किये वादे को पूरा कर पाई है. अब भला किस तरीके से 60% वाले बच्चों को रेगुलर बनायेंगे केजरीवाल, ये तो शायद उन्हें भी इसकी समझ नही होगी. रही बात बच्चों के एडमिशन की, नए कॉलेज खोलने के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा जरुरी ही नही है. 


3) कॉलेज एडमिशन में दिल्ली के छात्रों के लिए आरक्षण- प्रत्येक कॉलेज में 85 फीसदी सीटें दिल्ली के छात्रों के लिए आरक्षित होंगी.

-आम आदमी पार्टी चुनावों के वक़्त हमेशा ये मुद्दा उठाती है कि हम आरक्षण दिलवाएंगे दिल्ली के कॉलेजों में, लेकिन ये न तो पूर्ण राज्य के दर्जे से होगा, न ही ये कभी संभव हो सकता है.

इस लेख के लेखक ने आप के इस फर्जी प्रोपेगेंडे को अप्रैल 2014 में भी एक्सपोज कर चुका है कि आप का यह चुनावी वादा बिल्कुल फर्जी है और इसे अमल में लाना बिल्कुल असम्भव है.

पढ़िए लेखक द्वारा मांगे गए RTI जानकारी पर जबाब, जो डीयू ने दिल्ली सरकार को दिए थे-


   

RTI से संबंधित पूरी जानकारी के लिए पढ़े 5 वर्ष पुराना ब्लॉग 

4) शैक्षणिक सुविधाओं और शिक्षकों की संख्या का विस्तार- शिक्षा के नए कानून के मानकों के तहत अतिरिक्त स्कुल और कॉलेज बनाये जायेंगे एवं पर्याप्त संख्या में नियमित शिक्षकों की नियुक्ति की जायेगी.
- बगैर पूर्ण राज्य के दर्जे के भी ये काम आसानी से किये जा सकते है. आप ने खुद ये बात कई बार स्वीकार किये है कि वह नए स्कूल/कॉलेजों को खोलने के लिए कार्य कर रही है. रही बात शिक्षक नियुक्ति की तो ये काम इस सरकार की प्राथमिकता में है ही नही. 

5) गेस्ट शिक्षकों का स्थायीकरण – दिल्ली सरकार के स्कूलों में वर्तमान में कार्यरत सभी गेस्ट शिक्षकों को स्थाई किया जाएगा.

- गेस्ट टीचर की नियुक्ति में बड़ी धांधली की बू आ रही है, जिसकी जाँच होनी चाहिए कि बड़ी संख्या में असक्षम लोग कैसे गेस्ट टीचर बन गए. बीते दिने DSSB द्वारा लिए परीक्षा में 77% गेस्ट टीचर पास मार्क्स भी नही ला पाए, इन्हें स्थाई नियुक्ति देने का वादा समझ से परे है. 

पढ़े दिल्ली हाई कोर्ट में दिल्ली सरकार के हलफनामे का अंश, जो अधिवक्ता अशोक अग्रवाल जी की याचिका पर दिल्ली सरकार ने जमा किये थे -




6) मेडिकल और इंजीनियरिंग शिक्षा का विस्तार- नए मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों के द्वारा लगभग 10 हजार सीटों की बढ़ोतरी की जायेगी.

-दिल्ली विधानसभा में  वित्तीय वर्ष 2017-18 के अपने बजट भाषण में  दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया लगभग इतने ही सीटों की बढ़ोतरी की घोषणा कर चुके है. वह भी तब, जब पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग जन्म भी नही ले सकी थी, न ही आप ने इसे चुनावी मुद्दा बनाने का कोई गंभीर प्रयास किया. समझ से परे है कि इतने कांफिडेंस से पुरे एक्शन प्लान के साथ दावा करने वाले शिक्षा मंत्री पर आप को भरोसा नही है, या फिर कुछ न कर पाने के बहाने. 

पढ़िए विधानसभा में बजट भाषण का वह अंश 



7)200 पॉइंट रोस्टर लागू करेंगे- उच्च शिक्षण संस्थानों में 200 पॉइंट रोस्टर लागू किया जाएगा.

- केंद्र सरकार ने अध्याधेश के जरिये 200 पॉइंट्स रोस्टर लागू कर दिया है.   केजरीवाल केंद्र के फैसले पर जबरदस्ती रोटी तोड़ने की फ़िराक में लगे है.


आप की उपलब्धियों और उसके वादों में कोई दम नही है. ऐसा लगता है कि जो वाक्य चुने गए घोषणापत्र के लिए, वह बिना किसी सोच-समझ के शामिल कर लिए गए या फिर आप लोगों को बेवकूफ समझती है. कहना गलत नही होगा कि ये घोषणापत्र कम, झूठ का पुलिंदा अधिक है.